पृष्ठ

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

श्री कृष्णकुमार ‘नाज़' से योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम' की बातचीत

                      ग़ज़लों से अपनी रचना-यात्रा आरंभ करने वाले 10 जनवरी 1961 को ग्राम कूरी रवाना (मुरादाबाद) में ज्‍मे श्री कृष्णकुमार ‘नाज़' ने साहित्य की अन्य विधाओं- गीत, दोहा, नाटक आदि में भी साधिकार सृजन किया है। श्री नाज़ समर्थ रचनाकार तो हैं ही, साथ ही उन्हें एक कुशल संपादक के रूप में प्रतिष्ठापित करता है उनके यशस्वी संपादन में वाणी प्रकाशन से सद्यः प्रकाशित दोहा-संग्रह ‘दोहों की चौपाल'। उनके समग्र रचनाकर्म की विशेषता ताज़ा कथ्य और पुष्ट शिल्प की चाशनी में पगा होना है। उनकी ग़ज़लें जहाँ नज़ाकत के साथ बात करती हैं, वहीं उनके गीत ओस की बूँदों की तरह कोमल होते हैं। प्रसिद्ध शायर श्री कृष्णबिहारी ‘नूर' के प्रिय शिष्य 'नाज़' जी की प्रकाशित कृतियों- ‘इक्कीसवीं सदी के लिए'‘गुनगुनी धूप' (दोनों ग़ज़ल-संग्रह), ‘मन की सतह पर' (गीत-संग्रह) व ‘जीवन के परिदृश्य' (नाटक-संग्रह) के अतिरिक्त अनेक कृतियों की पांडुलिपियाँ प्रकाशन यात्रा पर हैं। प्रस्तुत हैं ऐसे बेमिसाल और बहुआयामी रचनाकार नाज़ जी से गीत व ग़ज़ल के संदर्भ में कवि योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम' की बातचीत-

‘व्योम': आपका सृजन कब और कैसे शुरू हुआ?

कृ.कु. नाज़ : व्योम जी! यह बड़ा रोचक प्रश्न किया आपने। इसके उत्तर के लिए मुझे 37-38 वर्ष पीछे लौटना पड़ेगा। गाने-गुनगुनाने का शौक़ बचपन से ही रहा है मुझे। छठी कक्षा में मेरा दाख़िला मुरादाबाद में पारकर इंटर कालेज में कराया गया। उस समय मेरे मामाजी मोहल्ला मंडीचौक में रहते थे, मुझे उन्हीं के पास छोड़ दिया गया। मुझे याद है एक बार मैं मुकेश का कोई गीत गा रहा था, तभी अचानक रजनी गुप्ता आ गईं, मैं उन्हें बुआ कहता था, मुझे गाते देखकर बोलीं- ‘‘अरे कृष्णकुमार तू गा रहा है, मैं समझी थी किसी ने ट्रांजिस्टर खुला छोड़ दिया है।'' बड़ा अच्छा लगता था। यह गाने-गुनगुनाने का शौक़ बना रहा। मैं रात को ट्रांजिस्टर सिरहाने रखकर सुनता रहता था और किसी एक ग़ज़ल को गुनगुनाकर उसी गुनगुनाहट में अपने शब्द ‘फिट' कर लेता था। समय बीतता रहा। न कोई कविसम्‍मेलन-मुशायरा देखा-सुना था, न कभी किसी काव्यगोष्ठी में भाग लिया था। आत्म-संतुष्टि के लिए लिखता रहता था। चूँकि मेरे लेखन की शुरूआत ग़ज़ल से हुई, तो मुझे उर्दू सीखने की आवश्यकता महसूस हुई। इसके लिए मैं गाँव में ही स्थित मदरसे में गया और एक मौलवीसाहब से उर्दू सिखाने का अनुरोध किया। उन्होंने मेरा निवेदन सहर्ष स्वीकार कर लिया। मैंने भी उर्दू का ख़ूब अभ्यास किया। उसी दौरान मैंने कुछ शेर कहे और मौलवीसाहब को सुनाने लगा। वेे मेरा उत्साहवर्धन करते हुए बोले- ‘‘भाई मैं शायरी नहीं जानता। हाँ, काँठ में मेरे एक दोस्त हैं, आप उन्हें अपने शेर सुनाइए, वे आपकी ज़रूर मदद करेंगे।'' मौलवीसाहब मुझे लेकर ‘ग़म' साहब के पास पहुँचे। ‘ग़म' साहब का पूरा नाम था रामकुमार वर्मा, ‘ग़म' बिजनौरवी तख़ल्लुस रखते थे, डी.एस.एम. कालेज काँठ में बड़ेबाबू थे और रिटायरमेंट के नज़दीक थे। उन्होंने बड़े प्यार से बैठाया और मेरी ग़ज़लें सुनीं। उस समय मैं मक़ते में ‘कृष्ण' उपनाम का प्रयोग करता था और देवनागरी में लिखता था। ग़मसाहब ने हिदायत दी कि आइंदा तुम उर्दू में लिखकर लाओगे और ग़ज़लों में ‘कृष्ण' तख़ल्लुस अच्‍छा नहीं लगता, इसलिए कोई तख़ल्लुस भी तज़वीज़ कर लेना। मैंने घर आकर तख़ल्लुस पर विचार किया। इसी दौरान मेरे ज़ह्‌न में ‘नाज़' शब्द आया और उसके बाद जब मैं ‘नाज़' तख़ल्लुस के साथ पर्सियन लिपि में ग़ज़लें लिखकर ले गया, तो ग़मसाहब बहुत ख़ुश हुए। हालाँकि ग़मसाहब से मेरी चंद मुलाक़ातें ही रहीं, लेकिन ग़ज़ल का सफ़र शुरू हो गया, जो आज तक जारी है।

‘व्योम': आप सुप्रसिद्ध शायर स्‍व. श्री कृष्णबिहारी ‘नूर' के शिष्य रहे हैं और आप उनके समग्र सृजन पर शोध भी कर रहे हैं, नूरसाहब के रचनाकर्म से आप कितना प्रभावित हैं और क्यों?

कृ.कु. नाज़ : जी हाँ, मैं नूरसाहब का शिष्य हूँ और मैंने उन पर शोध भी किया है। दरअस्ल उनकी पहचान सिर्फ़ उर्दू शायर के रूप में है, बहुत कम लोग जानते हैं कि नूरसाहब ने किशोरवया हिन्दी-ग़ज़ल की उँगली थामकर उसे चलने-फिरने का सलीक़ा सिखाया। इसीलिए मेरे शोध का शीर्षक था ‘हिन्दी-ग़ज़ल के संदर्भ में कृष्णबिहारी ‘नूर' का विशेष अध्‍ययन'। शायरी के क्षेत्र में मैं सबसे अधिक नूरसाहब से ही प्रभावित रहा हूँ।
दरअस्ल नूरसाहब को यशस्वी बनाने में उनके उत्‍कृष्ट विचारों का योगदान तो रहा ही, उनकी भाषा ने भी उनकी प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाये। नूरसाहब अपने शेरों में हिन्दुस्तानी भाषा का प्रयोग करते थे, जिसमें संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय उपभाषाओं के ऐसे बहुत से शब्द चहलक़दमी करते हुए पाये जाते हैं, जो आम आदमी की ज़ुबान पर तैरते रहते हैं। तपस्या, साधू, दुख-सुख, जन्म-जन्म, पूजा, सिन्दूर, चन्दन, चुनाव, आवागमन, ध्यान, धन, आयतन, नमन, हवन, आवश्यक, खटपट, स्वभाव, बन्धन, आरम्भ, मार्गदर्शक, संध्या, रूप, स्वयं, नयन, अवतार, साधना, अस्तित्‍व, दिशा आदि� ऐसे शब्द जो ग़ज़ल की परिधि से सदैव बाहर रहे, नूरसाहब ने उन्‍हें सम्मान सहित अपने शेरों में स्थान दिया। नूरसाहब के शेरों की यह विशेषता है कि उनमें अध्यात्म में श्रृंगार और श्रृंगार में अध्यात्म के दर्शन होते हैं।इसके अलावा नूरसाहब बहुत विशाल व्यक्तित्व के स्वामी थे। ‘अपनों का' बहुत ख़याल रखते थे, यही सब बातें थीं जिन्होंने मुझे सदैव प्रभावित किया।

‘व्योम': आपने साहित्य की अनेक विधाओं यथा- गीत, ग़ज़ल, दोहा, नाटक, मुक्तछंद आदि सभी में कुशलता के साथ सृजन किया है, फिर भी आपकी ख्याति एक महत्त्वपूर्ण ग़ज़लकार के रूप में ही रही , ऐसा क्यों?

कृ.कु. नाज़ : मैं ऊपर भी बता चुका हूँ कि मेरे लेखन की शुरूआत ग़ज़ल से हुई। आज भी मेरी प्रमुख विधा ग़ज़ल है, दूसरे नंबर पर गीत। हाँ, इस दौरान कुछ अन्य विधाओं में भी मैंने लेखन किया, लेकिन ख्याति मुख्यतः ग़ज़लकार के रूप में ही मिली। इस ख्याति में मेरी ग़ज़लों के साथ-साथ मेरा उपनाम ‘नाज़' भी सहायक रहा है। मूलरूप में ग़ज़लकार हूँ, इसलिए इसी रूप में पहचान हो गई।

‘व्योम': आजकल एक नयापन प्रचलन में है, वह यह कि हिंदी के रचनाकार ग़ज़लें और उर्दू के रचनाकार गीत लिख रहे हैं, परिणामतः शिल्पदोष का ख़तरा दोनों ही ओर उत्पन्न हो रहा है। आपका क्या मत है?

कृ.कु. नाज़ : व्योम जी, आपकी बात बिल्‍कुल सही है। हिंदी में ग़ज़ल और उर्दू में गीत, दोनों ही की स्थिति दयनीय है। लेकिन, यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किशोरावस्था में होने के बावजूद हिंदी-ग़ज़ल ‘परिपक्वता' की ओर बढ़ने लगी है, जबकि उर्दू में तो गीत की स्थिति बहुत ही कमज़ोर है। उर्दू के कई ‘बड़े शायर' मंचों पर गीतों की प्रस्‍तुति करते हैं, लेकिन उनकी स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। हिंदी वाले ग़ज़ल के छंदोविधान से पूर्णतः परिचित नहीं है और उर्दू वाले गीत की मात्रिक व्यवस्था से। यही कारण है कि दोनों ही विधाओं में कमज़ोरियाँ बरक़रार हैं। मैं नाम लेना उचित नहीं समझता, कई हिंदी कवियों ने ग़ज़ल के छंदोविधान को लेकर पुस्तकें लिख डाली हैं, लेकिन अधिकतर पुस्तकों की स्थिति अविश्वसनीय एवं राह से भटकाने वाली है। हमारे कई ‘बड़े' गीतकारों ने ग़ज़ल की दुनिया में क़दम रखा, लेकिन उनकी स्थिति हवा निकले ग़ुब्बारे की तरह फुस्स हो गई। इसका एकमात्र कारण है ग़ज़ल के छंदोविधान से अपरिचय।

‘व्योम': पिछले कई दशकों से यह प्रश्‍न लगभग अनुत्तरित है कि हिंदी ग़ज़ल क्या है? हिंदी भाषियों द्वारा लिखी गई ग़ज़ल या देवनागरी लिपि में लिखी हुई ग़ज़ल या कुछ और?

कृ.कु. नाज़ : भाई व्योम जी, बड़ा रोचक प्रश्न है आपका। विशेष बात यह है कि लगभग नहीं, बल्कि पूर्ण रूप से यह प्रश्न अनुत्तरित है। यदि हिन्दी ग़ज़ल के इतिहास को ध्यानपूर्वक देखा जाये तो फ़ारसी के प्रसिद्ध कवि अमीर ख़ुसरो (सन्‌ 1252-1325) से हिन्‍दी ग़ज़ल का प्रारम्भ हुआ, जिन्होंने खड़ी बोली में ग़ज़लें लिखीं। इनकी कई ग़ज़लों में यह विशेषता थी कि शेरों की एक पंक्‍ति फ़ारसी में होती थी, तो दूसरी खड़ी बोली में। जबकि, कुछ ग़ज़लें हिन्दी (तत्कालीन हिन्दवी) में भी पाई जाती हैं। अमीर ख़ुसरो ने ग़ज़लें या तो फ़ारसी में कहीं या तत्कालीन हिन्दी में। उर्दू तो बहुत बाद में, लश्करी ज़ुबान के रूप में अस्तित्व में आयी। इनके बाद इसी परम्परा का निर्वाह करते हुए कबीर ने ग़ज़ल लिखी। इनकी भाषा भी खड़ी बोली थी। इनके बाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, निराला, जानकी बल्लभ शास्त्री, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर सिंह, बलवीर सिंह रंग, गोपालदास नीरज आदि कवियों से होती हुई हिन्दी ग़ज़ल की यात्रा दुष्यन्त तक पहुँची। दुष्यन्त के बाद हिन्दी में ग़ज़ल लिखने वालों की होड़-सी लग गयी।अमीर ख़ुसरो से लेकर कबीर, मैथिलीशरण गुप्त, गयाप्रसाद शुक्ल सनेही, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र बद्रीनारायण प्रेमघन, प्रतापनारायण मिश्र, निराला, शमशेर बहादुर सिंह, दुष्यन्त कुमार तथा उसके बाद हिन्दी ग़ज़लकारों की एक लम्बी परम्परा है।
              कुछ लोग कबीर को हिन्दी का पहला ग़ज़लकार मानते हैं। मैं चाहता हूँ कि इन दोनों ही कवियों की एक-एक रचना आपको सुना दी जाये। अमीर ख़ुसरो की हिन्दी (तत्कालीन हिन्दवी) में लिखी गयी एक ग़ज़ल के कुछ शेर प्रस्तुत हैं-

जब यार देखा नैन भर, दिल की गई चिन्ता उतर
ऐसा नहीं कोई अजब, राखे उसे समझाय कर

जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया
हक्का इलाही, क्या किया आँसू चले भर लायकर

तू तो हमारा यार है, तुझ पर हमारा प्यार है
तुझ दोस्ती बिसियार है, इक शब मिलो तुम आय कर

जाना तलब तेरी करूँ, दीगर तलब किसकी करूँ
तेरी जो चिन्ता दिल धरूँ, इक दिन मिलो तुम आय कर

तुमने जो मेरा मन लिया, तुमने उठा ग़म को दिया
तुमने मुझे ऐसा किया, जैसे पतंगा आग पर

‘ख़ुसरो' कहें बातें ग़ज़ब, दिल में न लावें कुछ अजब
क़ुदरत ख़ुदा की है अजब, जब दिल दिया गुल लाय कर

                     यहाँ फ़िराक़ गोरखपुरी का कथन बहुत महत्‍वपूर्ण है- ‘‘मुसलमानों को हिन्‍दुस्तान में आकर बसे हुए कई शताब्दियाँ बीत चुकी थीं। भारत की भिन्न-भिन्न भाषाएँ बन चुकी थीं। उनमें अभी गद्य तो नहीं, लेकिन कविता की ध्वनि गूँजने लगी थी और सभी भाषाओं में हिन्दुओं के साथ-साथ उनकी ध्वनि में अपनी ध्वनि मिलाकर वे कविता कर रहे थे। ख़ुसरो, कबीर साहब, मलिक मोहम्मद जायसी, रसखान, आलम और इन्हीं के सदृश कई सौ दूसरे मुसलमान पुरुष और स्त्री हिन्दी कविता को मालामाल कर रहे थे। साथ ही साथ कई मुसलमान और कुछ हिन्दू फ़ारसी में भी काव्य रचना कर रहे थे।''

भले ही ख़ुसरो मूलरूप में फ़ारसी के कवि रहे हों, लेकिन साहित्यिक इतिहास इस बात का साक्षी है कि बहुत से ऐसे साहित्यकार हुए हैं, जिन्होंने एक-दो तो क्या, कई-कई भाषाओं में साहित्य सृजन किया है, जिनका एक साथ कई भाषाओं पर समान अधिकार रहा है। उस समय भले ही शासन की भाषा फ़ारसी रही हो, लेकिन हमें इस तथ्य को भी स्वीकारना चाहिए कि किसी भी दौर में शासन की भाषा जनसाधारण की भाषा नहीं रही। आम आदमी हमेशा अपनी क्षेत्रीय उपभाषाओं अथवा बोलियों में लिखता-पढ़ता और कार्य करता रहा। अमीर ख़ुसरो विद्वान भी थे और प्रयोगधर्मी भी। उन्‍हें संगीत का भी ज्ञान था। उनकी उक्त ग़ज़ल इस बात का भी सशक्त उदाहरण है कि तत्कालीन समाज में हिन्दी (अथवा हिन्दवी) का रूप खड़ी बोली में था, जो आज की हिन्दुस्तानी भाषा से मिलता-जुलता है। भले ही ख़ुसरो ने हिन्दी में कम ग़ज़लें कही हों, लेकिन कहीं तो। इसलिए हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि अमीर ख़ुसरो हिन्दी भाषा की ग़ज़ल के पहले कवि हैं।

कबीर की एक ग़ज़ल सुनिए-

हमन हैं यार मस्ताना हमन को होशियारी क्या
रहें आज़ाद या जग में, हमन दुनिया से यारी क्या

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-बदर फिरते
हमारा यार है हममें, हमन को इन्तज़ारी क्या

ख़लक सब नाम अपने को बहुत कर सर पटकती है
हमन हरिनाम राँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या

न पल बिछुड़े पिया हमसे, न हम बिछुड़े पियारे से
उन्हीं से नेह लागा है, हमन को बेक़रारी क्या

‘कबीरा' इश्क़ का नाता दुई को दूर कर दिल से
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सर बोझ भारी क्या

भले ही कबीर ने अपनी उक्त रचना को ग़ज़ल नाम न दिया हो, लेकिन यह ग़ज़ल के छन्द में है तथा भाव की दृष्‍टि से परिपूर्ण है। यह रचना मतला, क़ाफ़िया, रदीफ़, मक़ता, यानी ग़ज़ल की सभी आवश्‍यक शर्तों को पूर्ण करती है। ऐसे में इसे ग़ज़ल न मानना रचना के साथ अन्याय है। सूफ़ी सम्‍प्रदाय से जुड़े कवि� यार, पिया, पियारा, साईं, साहब� इस प्रकार की शब्दावली ईश्वर के लिए प्रयोग करते रहे हैं, इसलिए इस ग़ज़ल में लौकिक प्रेम तलाशना भी अनुचित है।कुछ विद्वान कबीर की उक्त रचना को भजन का नाम देते हैं। जबकि कुछ विद्वान कबीर को हिन्दी का पहला ग़ज़लकार मानते हैं, वहीं कुछ विद्वानों ने इस ग़ज़ल को उर्दू की पहली ग़ज़ल स्वीकारा है। उक्त रचना को एम.ए. ग़नी ने अपनी पुस्तक ‘हिस्‍ट्री अॉफ़ द पर्शियन लैंग्‍वेज़ एट ए मुग़ल कोर्ट' में उर्दू की पहली ग़ज़ल स्वीकारा है, लेकिन यह कथन उचित नहीं है, क्‍योंकि विद्वानों ने आधुनिक उर्दू कविता का पहला कवि वली (सन्‌ 1668�1744) को माना है। यद्यपि मौलाना मुहम्‍मद हुसैन आज़ाद ने तो वली को उर्दू का पहला कवि माना है। इन स्थितियों में यह कैसे सम्भव है कि कबीर की उक्त रचना उर्दू की पहली ग़ज़ल सिद्ध हो जाये। दूसरी बात यह है कि उक्त रचना की भाषा खड़ी बोली है, उर्दू नहीं। अतः ग़नी साहब की बात में दम प्रतीत नहीं होता है। हाँ, यह भी अवश्य है कि कबीर को हिन्दी ग़ज़ल का पहला कवि मान लिए जाने के पर्याप्य तथ्य उपलब्ध नहीं होते।

हिन्दी ग़ज़ल की विकास-यात्रा का तीसरा बिन्दु है भारतेन्दु युग, जो सन्‌ 1850�1885 तक रहा। यद्यपि भारतेन्दु जी के पिता गिरधरदास ने भी हिन्दी में कुछ ग़ज़लें कहीं। दो शेर द्रष्टव्य हैं-

हो गया मुझसे ख़फ़ा वो याद अब आता नहीं
जब से सब बेपीर आकर उसको बहकाने लगे

‘दास गिरधर' तुम फ़क़त हिन्दी पढ़े थे ख़ूब-सी
किस क़दर उर्दू के शायर में गिने जाने लगे

गिरधरदास की शब्दावली से ज्ञात हो जाता है कि वह हिन्दी कवि होते हुए स्वयं को ग़ज़ल लेखन में उर्दू का शायर मानते हैं। भारतेन्दु जी ने ग़ज़लें भी कहीं और नाटक भी लिखे। ग़ज़लें उन्होंने ‘हरिश्चन्द' तथा ‘रसा' उपनाम से लिखीं। उदाहरण के तौर पर उनके कुछ शेर प्रस्तुत हैं-

दिल मेरा ले गया दग़ा करके
बेवफ़ा हो गया वफ़ा करके

दोस्तो कौन मेरी तुरबत पर
रो रहा है रसा-रसा करक

यह तो नि्‍चित है कि इस कालखण्ड में भगवानदीन, प्रतापनारायण मिश्र, चौधरी प्रेमघन, गोपालदास ‘गुल', श्रीधर पाठक, अयोध्या सिंह उपाध्याय, जयशंकर प्रसाद आदि हिन्दी कवियों ने ग़ज़लें भी लिखीं। इसलिए इस युग मेंं हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में बहुत से प्रयोग हुए, जिनसे हिन्दी ग़ज़ल विकास के मार्ग पर अग्रसर हुई। इन कवियों की भाषा अवश्य हिन्‍ी रही, लेकिन कथ्‍य अधिकांश परम्परागत रहा। इस बीच बलवीर सिंह रंग, त्रिलोचन और शमशेर बहादुर सिंह, जानकी बल्लभ शास्‍त्री, विश्‍वम्भरनाथ उपाध्याय, हंसराज रहबर, रामावतार त्यागी आदि ने भी ग़ज़लें लिखीं, लेकिन ये भी परम्पराओं की भेंट चढ़ गईं। सभी का वर्ण्य-विषय प्रेम और सौन्दर्य रहा। शिल्प की दृष्टि से भी ये ग़ज़लें कमज़ोर रहीं। उर्दू मुहावरों का प्रयोग किया गया।

हिन्‍दी ग़ज़ल की विकास-यात्रा के चौथे और अनन्तिम बिन्दु हैं दुष्यन्त कुमार (1933�1975)। तत्समय 1940 के आसपास प्रयोगवाद और नयी कविता का आन्दोलन शुरू हुआ, लेकिन उस कविता में कविता के आवश्यक तत्व लय, छन्‍द, गेयता नहीं थे। यह कविता सिर्फ़ बुद्धिजीवी वर्ग तक ही सीमित रही। बिम्बों का ऐसा प्रयोग कवियों द्वारा किया गया कि समझने का प्रयास करने पर भी अर्थ समझ में न आये। ऐसी कविता से तत्कालीन पाठक और श्रोतावर्ग कट गया। तब आवश्यकता महसूस हुई ऐसी कविता की जिसमें काव्य के सभी आवश्यक तत्व उपलब्ध हों, और ऐसी कविता के रूप में ‘ग़ज़ल' पर रचनाकारों की दृष्टि पड़ी। ‘सूर्य का स्वागत' के माध्यम से नई कविता के क्षेत्र में प्रतिष्ठापित हो चुके दुष्यन्त कुमार ने ग़ज़ल विधा को अपनाया। यद्यपि उनकी ग़ज़लों में उर्दू-फ़ारसी के शब्‍द बड़ी संख्या में मिल जाते हैं, तथापि अपनी चुटीली शैली और कथ्य के कारण दुष्यन्त को काफ़ी प्रोत्साहन मिला। दुष्यन्त के बाद हिन्दी में ग़ज़ल लेखन के लिए रचनाकारों में होड़-सी लग गयी। सप्रयास ग़ज़लें लिखी गयीं, आज भी लिखी जा रही हैं। बल्कि हि्‍दी ग़ज़ल के नाम पर पाठकों और श्रोताओं के सामने बहुत-सा कूड़ा-करकट भी परोसा जा रहा है, क्‍योंकि ऐसे हिन्दी रचनाकार बड़ी संख्या में हैं, जो ग़ज़ल के छन्द से अपरिचित हैं। सीखने की उन्होंने कोशिश नहीं की, गुरु किसी को बनाते नहीं, त्रुटियाँ बताने वाले मित्रों से रुष्ट हो जाते हैं। परिणाम सामने है कि अधिकांश हिन्दी ग़ज़लों में गेयता का अभाव है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि दुष्यन्त हिन्‍दी ग़ज़ल की विकास-यात्रा के महत्‍वपूर्ण पड़ाव हैं, जहाँ से ग़ज़ल की भावभूमि ज़मीनी सच्चाइयों से जुड़ते हुए जनसाधारण की पीड़ाओं को सहलाती है और उनका उपचार बताती है।

देवनागरी में लिखी गई ग़ज़लों को हिंदी-ग़ज़ल कहना उचित प्रतीत नहीं होता, क्‍योंकि भाषा और लिपि में बहुत फ़र्क़ है। लिपि तो भाषा को लिखने का सिर्फ़ माध्यम है। हाँ, हिंदी कवियों द्वारा लिखी गई ग़ज़लों और हिंदी शब्‍दावली से सुसज्जित ग़ज़लों को हिंदी-ग़ज़ल की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। हालाँकि मैं तो हिंदी और उर्दू में कोई अंतर नहीं मानता। हिंदी का अर्थ है हिंद में पैदा हुई भाषा और उर्दू भी हिंदुस्तान में ही पैदा हुई है। मैं तो उर्दू को हिंदी का ही अंग मानता हूँ। अंतर केवल इतना है कि एक ही भाषा की दो लिपियाँ हैं- देवनागरी और पर्सियन।

‘व्योम': ग़ज़ल को तरन्नुम और तहत दोनों ही माध्यम से प्रस्तुत करने की परंपरा रही है, आप किसे उचित समझते हैं?

कृ.कु. नाज़ : यहाँ प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि शायर ‘रचनाकार' है या ‘गवैया'। हालाँकि हमारे बहुत से ‘मंचीय' शायर ऐसे हैं, जिन्होंने ग़ज़ल की प्रस्तुति तरन्नुम के साथ की, लेकिन यहाँ यह भी उल्‍लेखनीय है कि जिस शायर का तरन्नुम जितना ‘बड़ा' हो गया, उसका रचनाकार उतना ही ‘छोटा' हो गया। मुशायरे के मंच पर तो तरन्नुम से ग़ज़ल की प्रस्तुति करके श्रोताओं को लुभाया और रिझाया जा सकता है, लेकिन किताब के लिए ‘गला' कहाँ से आयेगा। परिणाम निकलता है कि ‘योग्य समीक्षक' तरन्नुम के अंक काटकर शायर को ‘रचनाकार' के निम्नतम अंक प्रदान कर देता है। यही कारण है कि अधिकतर रचनाकार साहित्यिक ऊँचाइयों के ज़ीने चढ़ने की कोशिश में हाँफकर, थक-हारकर बैठ जाते हैं। इसलिए मैं तरन्नुम को ग़ज़ल से अलग मानता हूँ, इसका महत्त्वपूर्ण अंग नहीं।

‘व्योम': अनेक ग़ज़लकारों ने ग़ज़ल के कथ्य में प्रयोगवादी परिवर्तन करने का प्रयास किया है, आधुनिक ग़ज़ल को आप समकालीन लेखन के कितना निकट पाते हैं?

कृ.कु. नाज़ : व्योम जी, ग़ज़ल आज उर्दू की सर्वाधिक प्रभावशाली और लोकप्रिय विधा है तथा उर्दू शायरी का महत्‍वपूर्ण काव्यरूप है। यह इसकी लोकप्रियता की बात है कि आज ग़ज़ल को ही उर्दू शायरी का अर्थ समझा जाने लगा है। बड़ी से बड़ी और गूढ़ से गूढ़ बात को शायर एक शेर यानी दो पंक्‍तियों में कह डालता है। इतनी संक्षिप्तता किसी और विधा में कहाँ। ग़ज़ल प्रेयसी भी है, ग़ज़ल प्रेमी का हृदय भी है और हृदय की धड़कन भी। किसी को ग़ज़ल के कजरारे नयन पसन्द हैं तो कोई इसके रूप का दीवाना है तो कोई इसके बाँकपन पर जान छिड़कता है। ग़ज़ल कोई एकान्त में सुनता है तो कोई महफ़िल में। ग़ज़ल अगर टूटे दिलों का सहारा है तो प्रेम में आकण्ठ डूबे मदमस्त प्रेमियों की कल्पनाओं का विस्तृत आकाश भी। ग़ज़ल में गाँव की मिट्‌टी की भीनी सुगन्ध है तो महानगरों का कोलाहल भी। अर्थात्‌ जीवन के हर पहलू को ग़ज़ल ने स्वयं में समेट लिया है।

देखा जाये तो ग़ज़ल चंद अशआर का छोटा-सा संकलन है और सोचा जाये तो वही संक्षिप्त संकलन विचारों का महासागर है। वह ज़माना और था जब राजा, महाराजा, बादशाह और नवाब हुआ करते थे, जब तवायफ़ें हुआ करती थीं, मुजरे हुआ करते थे, शराब और शबाब के दौर चला करते थे, जब ग़ज़ल पर ढोलक-मंजीरे का क़ब्‍ज़ा था, नर्तकियाँ नाचने-गाने के साथ साक़ी का कार्य भी करती थीं, जब हमारे साहित्यकार भी उसी रंग में रँगे हुए थे और ‘माननीयों' की जी-हुज़ूरी ही उनका उद्देश्‍य था, जब आम-आदमी से साहित्यकारों का कोई ख़ास लेना-देना नहीं था। यानी ग़ज़ल सिर्फ़ मनोरंजन की व्‍तु थी। ग़ज़ल का वर्ण्य-विषय औरतों का शरीर, शराब, साक़ी, पैमाना, गुलो-बुलबुल, फूल-तितली, शमअ-परवाना आदि ही हुआ करते थे। आज न वे राजे-महाराजे हैं, न रजवाड़े, न बादशाह रहे, न बादशाहत, न अब नवाब हैं, न उनकी रियासतें। आज परिस्थितियाँ बिल्‍कुल उलट गयी हैं। आज का रचनाकार सजग है। आज की ग़ज़ल पहली जैसी नगरवधू नहीं है, जिसका उद्देश्‍य नाज़-नख़रे के साथ सज-सँवरकर और अपना सर्वस्‍व गिरवीं रखकर धनोपार्जन करना होता है। आज की ग़ज़ल को कुलवधू की गरिमा प्राप्त है, जो मर्यादाओं के साथ सजती भी है, सँवरती भी है, खिलखिलाती भी है, भजन भी गाती है, पूजा भी करती है।

आज शायर अपने चारों ओर के वातावरण में जो देख रहा है, उसी को शेर के माध्‍यम से नज़्म कर रहा है। आज ग़ज़ल की दृष्टि में यदि ऊँची हवेलियाँ हैं, तो टूटी-फूटी झोंपड़ियों को भी वह नज़रअ्‍दाज़ नहीं कर रही है। यदि उसकी नज़र में चाक-चौबन्द सड़कें हैं, तो फ़ुटपाथ पर भी उसने अपनी दृष्टि दौड़ाई है।

‘महबूब से काव्यात्‍मक बातचीत' को ग़ज़ल की परिभाषा माना जाता है, लेकिन आज की ग़ज़ल पुरानी सीमाओं में क़ैद नहीं रही। आज की ग़ज़ल को पढ़कर और सुनकर लगता है कि हम बंद कमरे से निकलकर खुली हवा में साँसें ले रहे हों। यही कारण है कि आधुनिकता की चादर ओढ़े हुए ग़ज़ल आज भी ज़िंदा है और युवा है।

‘व्योम' : आपने गीतों का सृजन भी पर्याप्त संख्या में किया है और आपकी एक गीत-कृति ‘मन की सतह पर' भी प्रकाशित हो चुकी है, गीत आपकी दृष्टि में क्या है तथा इसकी क्या-क्या शर्तें व मर्यादाएँ हैं?

कृ.कु. नाज़ : गीत मेरी दृष्टि में क्या है? भाई मैं तो सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि ‘हृदय की अतल गहराइयों से निकले संवेदना के स्वर जब मन की असीम कल्पनाओं को वरमाला पहनाते हैं, तो गीत की रचना होती है।' गीत की शर्त है गेयता। यदि गेयता नहीं है तो गीत की सार्थकता प्रभावित होती है, भले ही उसमें कितने ही उत्कृष्ट विचार क्यों न हों। साथ ही गीत की अपनी छांदसिक सीमाएँ है, जिनका उल्‍लंघन किसी भी दशा में गीत के अस्तित्व को हानि पहुँचा सकता है। आज मंचों पर मैं बहुत से युवा गीतकारों को देखता हूँ, वे गीत के मात्रिक विधान को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। इससे गीत को हानि हो रही है।

‘व्योम': वर्तमान में अनेक गीत कवियों द्वारा गीत को विभिन्न नामों, यथा- नवगीत, जनगीत, प्रगीत, विगीत, सहजगीत आदि से विभिन्न स्वरूप प्रदान किए गए हैं, आप इससे कितना और क्यों सहमत अथवा असहमत हैं?

कृ.कु. नाज़ : भाई, अगर आप मुझसे पूछना चाहते हैं, तो मैं तो यही कहूँगा कि गीत स्वयं में विस्‍तृत भूमिकाओं और विशाल अर्थों वाला शब्द है। इसे यदि नवगीत, जनगीत, प्रगीत, विगीत, सहजगीत, अगीत आदि नामों से अलंकृत किया जाता है तो यह किसी भी दशा में उचित नहीं। छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर हम इस विधा को कमज़ोर कर रहे हैं। मैं अक्‍सर देखता हूँ कि नवगीत के नाम पर कतिपय रचनाकार उल्‍टी-सीधी बातें छंद में पिरो देते हैं। कविता का आधार सिर्फ़ छंद ही तो नहीं है। कुछ रचनाकारों का कहना है कि नवगीत जनसमस्याओं से जुड़ी हुई विधा है, जिसमें आमजन की पीड़ा को नये बिंबों और नये प्रतिमानों के साथ अभिव्यक्त किया जाता है। लेकिन, अक्सर देखने में आता है कि हमारे बुद्धिजीवी वर्ग के ‘पढ़े-लिखे लोग' कुछ ऐसे बिंबों का प्रयोग गीत में करते हैं कि उसके अर्थ निकाल पाना मुश्किल हो जाता है। परिणाम यह निकलता है कि हम जिसके लिए नवगीत लिख रहे हैं, वही व्यक्ति उससे वंचित रह जाता है। ऐसी रचनाधर्मिता का क्‍या लाभ? कई ऐसे लोग जो छंद का ज्ञान नहीं रखते, वे तो ‘गद्यगीत' के नाम पर ऐसी ‘दिमाग़ी' रचनाएँ लिख डालते हैं कि पढ़े-लिखे लोग भी उनके अर्थों की सीमाएँ नहीं छू पाते। परिणाम शून्य हो जाता है। आख़िर ऐसी रचनाओं का क्‍या लाभ, जो लोगों की समझ में ही न आ सकें। इसलिए मैं तो इस विधा में सिर्फ़ एक शब्द का समर्थक हूँ, और वह है ‘गीत'।

‘व्योम': आप कवि सम्मेलनीय मंचों से भी जुड़े रहे हैं, आज अकविता के समय में क्या मंचों पर पुनः गीत का वही स्‍वर्णिम समय वापस लौटने की आशा की जा सकती है?

कृ.कु. नाज़ : व्‍योम जी, आपका यह प्रश्न बहुत महत्‍वपूर्ण है। ‘गीत' हिंदी काव्य-साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा रही है। हालाँकि हास्य की विधा उस समय भी रही है, जब गीत का मंचों पर साम्राज्य था, लेकिन मात्र मनोरंजन और रस-परिवर्तन के लिए। इससे अधिक हास्य की कोई बिसात नहीं थी, लेकिन बदलते वर्तमान परिवेश में हास्य ने गीतों को पीछे धकेलते हुए मंच पर प्रमुख स्थान पाया। यह समाज की कमज़ोरी नहीं, यह हमारी खोखली व्यव्‍थाओं की कमज़ोरी है। नतीजा भी सामने है कि आज फूहड़ हास्य की अतिवादिता ने संश्‍लिष्ट व्यंग्य को भी हानि पहुँचाई है। आज लोग हास्य कविता का नाम आते ही टी.वी. का चैनल बदल लेते हैं। सीधा-सा अर्थ है कि हास्य कविताएँ परिवार के साथ सुनने की चीज़ नहीं रह गई हैं। लेकिन, छिटपुट गीतों को छोड़कर गीत आज भी हिंदी काव्य-साहित्य की मुख्य धारा से जुड़ा हुआ है। गीत को लोग आज भी निष्ठा के साथ सुनते हैं और प्रोत्साहित करते हैं। आज हमारे ही कुछ गीतकार साथी ‘परफ़ार्मर' की भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं, सिर्फ़ पैसे के लिए। संचार माध्यमों के ज़रिये उनकी पैसे की मनोकामना तो पूर्ण हो जाती है, लेकिन साहित्य उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा। गीत की दुनिया से वे ‘दूध की मक्खी' की तरह निकालकर फेंक दिए जाएँगे। आिख़र समय सबसे बड़ा निर्णायक है। वह दूध को दूध की श्रेणी में और पानी को पानी की श्रेणी में रखना जानता है। इस सबके बावजूद गीत का भविष्य मेरी दृष्टि में स्वर्णिम है।

‘व्योम': गीत को केंद्र में रखकर अनेक पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं, हाल ही में इंटरनेट पर ‘गीतपहल' नाम से गीत को समर्पित पत्रिका शुरू हुई है, अनेक ब्लाग्स भी हैं, जिन पर गीत को आगे लाने के लिए काफ़ी श्रम किया जा रहा है, इन प्रयासों से गीत के भविष्य को आप किस तरह देखते हैं?

कृ.कु. नाज़ : भाई, छांदसिक कविताओं के संक्रमण के दौर में गीत को समर्पित ‘गीत-पहल' जैसी इंटरनेट पत्रिका का गीत की दुनिया में प्रवेश गीत के अच्‍छे भविष्य का संकेत है। मैं भाई अवनीश चौहान जी, आप और आपके सभी साथियों को साधुवाद और बधाई देना चाहता हूँ कि आप लोगों ने गीत के क्षरणकाल में उसकी बागडोर सँभाली है। अवनीश जी समर्थ गीतकार हैं, ऊर्जावान व्यक्ति है और बग़ैर हानि-लाभ की चिंता किए, वह गीत पर सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ कार्य कर रहे हैं, इससे निश्चित रूप से गीतविधा का भी भला होगा और गीत-पहल के संपादक-मंडल को भी ख्याति प्राप्त होगी। गीत के उज्ज्वल भविष्य के लिए एक और बात बेहद ज़रूरी है, वह यह कि गीत-केंद्रित पत्रिकाएँ अच्छी और सच्ची गीत रचनाधर्मिता को आगे लाने के लिए ईमानदारी से काम करें।

‘व्योम': क्या आप महसूस करते हैं कि लंबे समय से गीत के विरुद्ध एक मोर्चा सुनियोजित रूप से लामबंद है, यदि हाँ तो हिंदी साहित्य पर इसका दूरगामी प्रभाव क्या होगा?

कृ.कु. नाज़ : व्योम जी, गीत के विरुद्ध चाहे कितने ही मोर्चे लामबंद हों, लेकिन वह कभी नहीं मर सकता। सृष्टि की हर वस्तु में गीत समाया हुआ है। हालाँकि आज अधिसंख्य समाचार-पत्र छंद से अनभिज्ञ बुद्धिवादियों के ‘सुलगते शब्दों' को कविता की श्रेणी में ला खड़ा कर देते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि जनरुचि भी कोई चीज़ है। जहाँ न छंद हो, न भावों की सौम्यता हो, न भाषा की एकरूपता हो, वह तथाकथित कविता समाज का मार्गदर्शन कैसे कर सकती है? परिणाम सामने है कि गीत का विरोध करने वाले आज धूल चाट रहे हैं।

‘व्योम': आपकी नाटक-संग्रह की एक पुस्तक ‘जीवन के परिदृश्य' प्रकाशित हुई है, क्या आपको नहीं लगता कि नाट्‌यलेखन में वर्तमान में अपेक्षाकृत ह्रास की स्थिति उत्पन्न हुई है, जबकि इस महत्‍वपूर्ण विधा पर पूर्व में प्रचुर सृजन हुआ है?

कृ.कु. नाज़ : भाई, नाटक हिंदी साहित्य की महत्‍वपूर्ण विधा थी, जब लोगों के पास पर्याप्त समय था, इक्का-दुक्का फ़िल्में बरसों में तैयार होती थीं, जब फ़िल्में किसी थियेटर में सिल्वर, गोल्डन और डायमंड जुबली मनाती थीं। वह ऐसा समय था, जब फ़िल्मों का टिकट लेने के लिए क़तारें लगा करती थीं और दूरदराज़ से आने वाले लोग एकाध वक़्त का खाना साथ लाते थे। टिकट न मिलने पर वहीं बैठकर खाना खाते थे और दूसरे शो का टिकट मिलने की प्रतीक्षा करते थे। आज स्थितियाँ उलट गई हैं। आज सिनेमाघरों पर भीड़ नहीं मिलती। न वो फ़िल्‍में आ रही हैं, न लोगों के पास इतना समय है कि सब काम-धाम छोड़कर तीन घंटे तक फ़िल्म देखें। टेलीविज़न ने सारी सुविधाएँ घर बैठे ही मुहैया करा दी हैं। पहले नुक्कड़ नाटक हुआ करते थे और इसके अलावा भी नाटकों के कार्यक्रमों में लोक रुचि लेते थे। आज का भाग-दौड़ का परिवेश इन सबकी इजाज़त नहीं देता। यही कारण है कि जनरुचि घटने के साथ-साथ साहित्यकारों में भी नाट्‌यलेखन के प्रति रुचि कम होती जा रही है।

‘व्योम': गीत और ग़ज़ल दोनों के संदर्भ में नयी पीढ़ी की दशा और दिशा के विषय में आपका मत क्या है? गीत और ग़ज़ल का भविष्य नयी पीढ़ी के हाथों में कितना सुरक्षित और स्वर्णिम है?

कृ.कु. नाज़ : ग़ज़ल हमारे देश में एक आयातित विधा है, जो अमीर ख़ुसरो के समय में ‘हिंदवी' में शुरू हुई। उस समय उर्दू तो थी भी नहीं। यह तो बहुत बाद में लश्‍करी ज़बान के रूप में सामने आई। ‘हिंदवी' में ग़ज़ल ने पाँव पसारे, लेकिन बाद में उर्दू विकसित हुई और वह ग़ज़ल की दुनिया पर छा गई। आज ग़ज़ल उर्दू की महत्वपूर्ण विधा है। इसी प्रकार ‘गीत' हिंदी काव्य-साहित्य का महत्‍वपूर्ण अंग है। यह ग़ज़ल की लोकप्रियता का प्रमाण है कि आज इसे कई भाषाओं में लिखा जा रहा है। इसी प्रकार गीत रचना भी कई भाषाओं में हो रही है। जहाँ तक नयी पीढ़ी के हाथों इन विधाओं के भविष्य का प्रश्न है, तो वह आज भी उज्ज्वल है और कल भी उज्ज्वल रहेगा। हालाँकि नई पीढ़ी के लोग अपनी रचनाओं पर अपने वरिष्ठ रचनाकारों के सुझाव/संशोधन प्राप्त करने से बचने की प्रवृत्ति के शिकार हैं, लेकिन फिर भी नई पीढ़ी नई सोच और कहन के साथ अपनी रचनाधर्मिता को सामने ला रही है, यह बहुत सुखद है। ये दोनों ऐसी विधाएँ हैं, जो किसी न किसी ज़रिये जनसामान्य के कानों से टकराती रहती हैं और उनके मनोरंजन तथा दिशा-निर्देशन का माध्‍म बनती हैं, इसलिए इन दोनों ही विधाओं के भविष्य पर कोई संकट नहीं है। नयी पीढ़ी इन दोनों ही विधाओं को दुलार रही है और सुरक्षित रख रही है।

आज गीत के क्षेत्र में सर्वश्री योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम', अवनीश चौहान, मूलचंद ‘राज', जय चक्रवर्ती, डा. अजय पाठक, मनोज जैन ‘मधुर', आनंद तिवारी, देवेन्द्र सफल, राजा अवस्‍थी आदि तथा हिंदी-ग़ज़ल के क्षेत्र में दीपक जैन ‘दीप', अरविंद ‘असर', आलोक श्रीवास्‍तव, अशोक ‘अंजुम', कमलकिशोर ‘भावुक', राजेश रेड्‌डी, सुरेश कुमार आदि बहुत से युवा रचनाकार हैं जो हिंदी साहित्य में अपनी-अपनी विधाओं को समृद्ध कर रहे हैं।

‘व्योम': आपके संपादन में ‘दोहों की चौपाल' शीर्षक से दोहों का समवेत संकलन वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है, दोहों में प्रायः पाये जाने वाले शिल्प दोष के संदर्भ में आप क्या कहेंगे? अन्य विधाओं में भी क्या कोई ऐसे ही समवेत संकलन के प्रकाशन की योजना है?

कृ.कु. नाज़ : भाई व्योम जी, ‘दोहों की चौपाल' में 109 रचनाकारों के 16-16 दोहे सम्‍मिलित हैं। मैंने 25-25 दोहे लोगों से मँगवाए थे, लेकिन कुछ ऐसे रचनाकारों के दोहे पढ़कर निराशा हाथ लगी, जो मात्राओं की सीमाओं का उल्‍लंघन करते दिखाई दिए। दोहा विधा तो हिंदी काव्य-साहित्य की रीतिकाल से लेकर आज तक लोकप्रिय विधा रही है। हाँ, पहले और आज की विषयवस्तु में परिवर्तन अवश्य हुआ है, यह ज़रूरी भी था, क्योंकि समय के साथ-साथ परिवर्तित न होने वाली विधाएँ या तो पिछड़ गईं या मर गईं। लेकिन, दोहा ऐसे में भी सीना तानकर अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहा है। इसे दोहे की लोकप्रियता ही कहा जाएगा कि आज उर्दू रचनाकार भी दोहे लिखने का प्रयास कर रहे हैं। ‘दोहा' भी ग़ज़ल और गीत की तरह हमेशा जीवित रहेगा। मेरी योजना भविष्‍ में ग़ज़ल और गीत पर समवेत संकलन प्रकाशित करने की है।

‘व्योम': आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

श्री कृष्ण कुमार 'नाज़' का पता -
सी - 130, हिमगिरी कालोनी, कांठ रोड,
मुरादाबाद - 244001  (उ०प्र०)
मोबाइल - 09927376877 


   

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

श्री देवेन्द्र शर्मा ‘इंद्र' से योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम' की बातचीत


                 साहित्य  का सृजन करना और साहित्य को जीना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। साहित्य को जीकर रचने वाला ही सच्चा  साहित्य-साधक कहलाता है। एक अप्रैल 1934 को नगला अकबरा, ज़िला आगरा में जन्मे हिंदी गीत-नवगीत सहित अनेक विधाओं में अपना मह्त्वपूर्ण और सशक्त  सृजन करने वाले वरिष्ठ  साहित्यकार श्री देवेन्द्र  शर्मा ‘इंद्र' जी के 13 नवगीत-संग्रह, चार दोहा-संग्रह, दो ग़ज़ल-संग्रह, दो खंड-काव्य  एवं 17 संपादित समवेत संग्रहों समेत 50 कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। साथ ही अनेक पांडुलिपियाँ प्रकाशन-पथ पर हैं। इंद्र जी का खंडकाव्य ‘कालजयी' आगरा विश्वविद्यालय में बी.ए. पाठ्‌यक्रम में सम्मलित है तथा इसके अतिरिक्त उनके अनेक गीत-नवगीत विभिन्न  वि्‍वविद्यालयों में पाठ्‌यक्रमों में सम्मलित हैं। उनकी रचनाधर्मिता पर अब तक सात शोधकार्य हो चुके हैं। हिंदी साहित्य के ऐसे अद्‌भुत और बहुआयामी रचनाकार इंद्र जी से गीत-नवगीत सहित अनेक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक संदर्भों पर बातचीत की युवा कवि योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम' ने-

‘व्योम'ः आपकी गीत-यात्रा कब और कैसे शुरू हुई? इस गीत यात्रा में आप किन गीतधर्मियों की रचनाधर्मिता से सर्वाधिक प्रभावित रहे?

दे.श. इंद्र ः जहाँ तक मुझे याद आता है मेरी मनोभूमि में गीत और कविता के प्रति आकर्षण और सम्मोहन   तभी से अंकुरित होने लगे थे, जब मैं केवल दस-बारह वर्ष की आयु का था। उन दिनों हमारा देश राजनैतिक स्तर  पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद  के निरंकुश शिकंजे में फँसा था। अतः एक ओर यदि महात्मा गाँधी के नेतृत्व   में स्‍वतंत्रता का अहिंसात्मक संग्राम लड़ा जा रहा था, तो दूसरी ओर युवजन हृदय सम्राट सुभाषचंद्र बोस के प्रभाव के चलते सशस्त्र क्रांति की लपटें भी उठ रही थीं। द्वितीय विश्‍वयुद्ध के चलते जीतते हुए अंग्रेजी राज के भी जर्मनी और जापान जैसे विपक्षियों ने छक्के छुड़ा रक्खे थे। ‘अंग्रेजों! भारत छोड़ो', ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद' और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा' के नारों से हमारे राष्ट्र का आकाश गुंजायमान था। पढ़े-लिखे समाज में राष्‍ट्र-भावना की लहर भीतर-भीतर ही हिलोरें मार रही थी। उन दिनों समस्त  हिंदीभाषी क्षेत्र में ‘भारत-भारती' का पाठ ‘श्रीमद्‌भगवद्‌गीता' की तरह किया जाता था। मेरे पिताजी आगरा में अध्‍यापक थे। अतः जब वे शनिवार की रात को गाँव आते तो अपने आसपास एकत्र हुए लोगों को शहर, देश और विदेश की घटनाओं से अखबार पढ़कर अवगत कराते। रविवार को लगभग दो-तीन घंटे का समय मुझे पढ़ाने में लगाते थे। पिछले सप्‍ताह का दिया हुआ काम देखते और हमारे परिवार के सेवाराम बाबा के द्वार पर सबको ‘भारत-भारती' सुनाते और उसका अर्थ समझाते थे। उन्‍हीं दिनों वे मेरे लिए ‘जयद्रथवध' की एक प्रति लाये थे। मेरे घर में तुलसीदास की अनेक कृतियों के अतिरिक्‍त वैद्यक, ज्‍योतिष, पौरोहित्‍य, नीतिशास्त्र आदि विषयों की सानुवाद संस्‍कृत-पुस्‍तकों का भी अच्‍छा खासा ज़खीरा था। मैं मनोयोगपूर्वक उनको उलटता-पुलटता रहता था और जो बात समझ में नहीं आती, उसे अपने पितामह से पूछ लिया करता था। गाँव में रहते ही मैंने पिताजी से उर्दू की लिपि का ज्ञान प्राप्‍त कर लिया था और ज़बर, ज़ेर, पेश, दो चश्‍मी हे, की मदद से ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध्‍, फ और भ को उसकी रस्‍मुलखत में लिखना भी सीख लिया था। संस्‍कारतः मेरी रुचि जितनी कविता और साहित्‍य के प्रति उदग्र और सक्रिय थी, उतनी ही गणित की ओर से उदासीन। यों, चालीस तक पहाड़े और पौआ, अद्धा, पौन, सवैया, ड्‌योढ़ा और पोंचा तक के पहाड़े भी मुझे पिताजी ने उन दिनों रटा दिये थे। मैं पिता के अतिरिक्‍त भी उन्‍हें अपना ‘आदर्श चरितनायक' मानता था। उनकी हस्‍तलिपि बेहद खूबसूरत और साफ़-सुथरी तथा निर्दोष थी, जिसका प्रत्‍यक्ष प्रभाव मेरी लिखावट पर भी पड़ा था। आज भी याद है 2 अक्‍टूबर 1947 का दिन जब मैं आठवीं कक्षा का छात्रा था और मुझे हिंदी-उर्दू तथा अंग्रेजी की सुलेख प्रतियोगिता में 10 रुपये का उच्चतम पुरस्‍कार और ढेरों पुस्तकें प्रदान की गयी थीं। एक ‘डिक्‍शनरी' के साथ सन्‌1943 में पिताजी ने अपने ही स्‍कूल में तीसरी कक्षा के छात्रा के रूप में प्रवेश करा दिया था। कदाचित्‌ आज आपको विश्वास न हो, तब तक तुलसी, रसखान और नरोत्तमदास के मुझे लगभग सौ-डेढ़ सौ कवित्त और सवैये और इतने ही संस्कृत के श्‍लोक कंठाग्र करा दिए थे। कवित्त और सवैयों की लय तो जैसे मेरे रक्त में बोलने लगी थी। तभी तो राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के वध पर मैंने लगभग पचास-साठ छंद लिख डाले थे। आठवीं कक्षा में अंग्रेजी सिखाने के लिए पिताजी ने पड़ोस के एक वयोवृद्ध सज्जन श्री उमाशंकर कुलश्रेष्‍ठ को 10 रुपये माहवार पर मेरा ट्‌यूटर नियुक्त कर दिया था। वे स्वयं ब्रजभाषा के कवि थे, अतः मैंने उनसे छंदोज्ञान की विधिवत्‌ दीक्षा ली थी।

पाँचवीं से लेकर आठवीं कक्षा तक मैं एक आर्यसमाजी स्कूल का छात्रा रहा, फिर नौवीं और दसवीं कक्षा मैंने आगरा के बैप्‍टिस्‍ट मिशन हाईस्कूल से उत्तीर्ण की। जिस वर्ष दसवीं का छात्रा था, मैं स्‍टूडेंट लाइब्रेरियन बना दिया गया। उस वर्ष हिंदी प्रभाग में जितनी पुस्तकें थीं, उनमें से 90 प्रतिशत कविता-संग्रहों, कहानी-संग्रहों, नाटकों और उपन्यासों को मैं दीमकों की तरह चाट चुका था। दूसरे छात्रों में पढ़ने-लिखने की रुचि भी न थी। हाईस्कूल की परीक्षा से पूर्व तीन महीने तक जो ‘प्राइवेट इंग्‍लिश ट्‌यूटर' मिले, वे भी संयोग से उस समय के श्रेष्ठ कवि, कथाकार और उपन्यास लेखक थे, जो उसी वर्ष झाँसी से एल.टी. करने के लिए आगरा आये हुए थे। उन्हीं की प्रेरणा से मेरा झुकाव खड़ी बोली में काव्य-रचना की ओर हुआ। ‘प्रसाद', ‘पंत', ‘निराला' और ‘महादेवी' की रचनाओं ने बेहद प्रभावित किया था। ‘बच्चन' जी की बोलचाल की भाषा और सपाट बयानी मुझे अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाई, यद्यपि तब तक मैं ‘मधुबाला', ‘मधुकलश', ‘निशा निमंत्रण', ‘एकांत संगीत', ‘आकुल अंतर' और ‘प्रणय पत्रिका' का भी आद्योपांत वाचन कर चुका था। छायावादी कवि मेरे तब आदर्श और श्रद्धाभाजन थे, तथापि नरेंद्र शर्मा, ‘अंचल' और हरिकृष्‍ण ‘प्रेमी' के गीतों के प्रति आत्मीयता भरा मैत्रीभाव रखता था। आगरा कालेज, आगरा में जुलाई सन्‌1950 में जब इंटरमीडिएट का छात्रा बनकर आया, तब आज के वरिष्ठ गीतकार श्री जगत प्रकाश चतुर्वेदी मेरे सहपाठी बने और हम दोनों चोली-दामन की तरह ज़िंदगी भर के लिए एक हो गये। तभी सर्वश्री ‘कमलेश', राजेंद्र यादव ओर घनश्याम अस्थाना के साथ गहरा सामीप्य रहा। कालेज जीवन में मैंने संस्कृत और अंग्रेज़ी काव्य का विशद और गंभीर अध्ययन किया। पं. हरिशंकर शर्मा ‘कविरत्‍न', रांगेय राघव, डा. रामविलास शर्मा, महेंद्र जी (सं. साहित्‍य संदेश) और पं. हृषीकेश जी चतुर्वेदी जैसे साहित्य के उज्ज्वलतम नक्षत्रों की आलोक-छाया में रहकर मैंने अपने सर्जकीय व्यक्तित्व को बनाया-सँवारा था। अतः किसी एक व्यक्ति-विशेष का न होकर मैं अपने संपूर्ण तत्कालीन परिवेश का ऋणी हूँ। बड़े भाग्य से ही मिल पाता है हर उदीयमान प्रतिभा को ऐसा प्रभावशाली परिवेश। सन्‌1948-49 से प्रारंभ हुई मेरी वह गीतयात्रा आज तक अविराम गति से मुझमें स्पंदमान है।

‘व्योम'ः ‘प्रत्येक नवगीत प्रथमतः गीत है, किंतु प्रत्येक गीत नवगीत नहीं होता' नवगीत के संदर्भ में आपका ब्रह्मवाक्य है, साथ ही ‘नवगीत दशक', ‘यात्रा में साथ-साथ', ‘शब्दपरी', ‘नवगीत और उसका युगबोध्‍', ‘धर पर हम' आदि अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें भी आईं, किंतु नवगीत का एक सर्व स्वीकार्य पारिभाषिक चित्र प्रस्तुत नहीं हो सका। आपको क्या लगता है?

दे.श. इंद्र ः ऊपर आपने जिसे मेरा ‘ब्रह्मवाक्य' माना है, पहले उसके विषय में कुछ निवेदन करना आवश्यक है। वस्तुतः उसमें गीत और नवगीत के मध्यवर्ती शै्‍पिक और अंतर्वस्तुमूलक संबंधों की ओर संकेत किया गया है। ‘गीत' अपने आपमें एक दूरांतगामी, धारावाहिक अर्थ व्यंजना वाला शब्द है जो श्रीमद्‌भगवद्‌गीता, गीत गोविंदम्‌, भागवत, थेरी गाथा से लेकर, गाहा सतसई तक अविकल रूप से प्रवाहमान रहा है। वैदिक युग से तत्काल पर्यंत कालांतर में चंडीदास, सूर, विद्यापति, तुलसी एवं अष्टछाप के सूरे तक कवियों की रचना में सतत विकासोन्मुख रूपांतरण हुआ। खड़ी बोली में आते-आते उसे फारसी और उर्दू की ब”रों का सान्निध्‍य भी प्राप्त होने लगा। पंत जी के ‘पल्लव' और ‘निराला' जी के ‘परिमल' की भूमिकाएँ भी यहाँ द्रष्टव्य हैं, जिनसे ज्ञात होगा कि विविध प्रकार की लयात्मकता से किस प्रकार नये-नये छंद आविष्कृत हुए हैं। इसमें भी कोई दो मत नहीं हैं कि जहाँ छायावाद के कवियों का झुकाव बहुत कुछ स्वच्छंदतामूलक होते हुए भी मूलतः क्‍लासिकी था, वहीं उनके किंचित्पश्चादवर्ती बच्चन जी की कविता का झुकाव एकांततः रोमानी था जिसका मूलाधार था अंग्रेजी और उर्दू। यह मार्ग अधिक सुगम, सुकर और लोकप्रियतावादी था। अतः कवि-सम्‍मेलन और मंच के कवियों द्वारा सहज ही अनुकरणीय हुआ। यही कारण है कि ‘पल्‍लव', ‘गुंजन', ‘गीतिका' और ‘दीपशिखा' के गीत क्लासिकल हुए और ‘मधुशाला' तथा बच्चन जी के गीत रोमांटिक। अस्तु इस बच्चनीय परंपरा में जो गीत लिखे गये वे भी छंद की कसौटी पर ढीले और दोषपूर्ण नहीं थे, तथापि उन छांदसिक पद्धतियों के माध्‍यम से नई विषयवस्‍तु प्रस्तुत की जाती थी, वह नारी की देह के इर्द-गिर्द ही घूमने वाली थी। उसमें स्त्री के शारीरिक रूप के प्रति एक उद्दाम लिप्सा, भोगवादी रिरिसा, अतृप्ति, संयोग-वियोगमूलक भावोद्रिक्त हर्ष-विषाद की गलदश्रु प्रधरता रहती थी। नवगीत ने भी उन्हीं पूर्व स्वीकार्य लयों और छन्दों को अपनी भावाभिव्यक्ति का उपजीव्य बनाया था। अतः परम्पराभुक्त  गीत और नवगीत बाह्ययतः समरूप प्रतीत होते थे, तथापि विषयवस्तु की दृष्टि से दोनों में धरती-आकाश का अंतर था। हिंदी नवगीत के शीर्षपुरुष डा. शंभुनाथ सिंह के दो अति संदर्भित गीतों के हवाले से मैं अपनी बात को और स्पष्ट करना चाहूँगा। पहला गीत है- ‘समय की शिला पर मधुर चित्र कितने किसी ने बनाये, किसी ने मिटाये' जो एक श्रेष्ठ किंतु परम्पराभुक्त गीत है, किंतु इसके विरुद्ध ‘पुरवैया धीरे बहो, मन का आकाश उड़ा जा रहा है' अपने समय का एक श्रेष्ठ नवगीत है। इस गीत की आत्मा भी यद्यपि श्रृंगाराश्रित है, तथापि इसके लोकलयाश्रित छंद, आंतरिक संगीत और बिंबधर्मिता ने इसे एक उम्दा नवगीत बना दिया है। गीतों की यह न्यूनाधिक द्वैधता सभी प्रारंभिक नवगीतकारों में रही है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। पुराने संस्कारों से मुक्ति और नवीन के वरण में कुछ समय तो लगता ही है। दशकों के परवर्ती गीतकार इस मशक्कत से वंचित रहे, क्‍योंकि उन्‍हें अपेक्षाकृत चलने के लिए एक बना-बनाया रास्ता मिला था। यह एक अलग बात है कि अधिकांश लोग आज भी पचास वर्ष पुरानी शैली में लिख रहे हैं और फिर भी चाहते यही हैं कि उन्हें नवगीतकार के रूप में स्वीकृति मिल जाय। आज तो अनेक संपादकों के अज्ञान के कारण भी ऐसी भ्रांति फैलायी जा रही है, जिसे देखकर ‘हँसा' या ‘रोया' ही जा सकता है।

यह सत्य है कि ‘दशकत्रयी', ‘अर्द्धशती' और ‘यात्रा में साथ-साथ' तथा अन्य बहुतेरे समवेत संग्रहों के प्रकाशन के बावजूद नवगीत की कोई सर्व लोकमान्य परिभाषा या पहचान नहीं बन पाई, यह स्वयं में नवगीत के पक्ष में ही जाता है न कि विरोध में। एक रचनाकार ही अपने जीवन में बार-बार नये-नये प्रयोग करता है और इन संग्रहों में तो अनेक रचनाकार थे, जिनकी अपनी-अपनी पृथक भावभूमि, संस्कार, शिक्षा-दीक्षा, परिवेश और शिल्पगत विशेषताएँ थीं और आज भी हैं। यदि सभी एक जैसे छंदों, बिंबों, प्रतीकों और विषयों का चयन करते तो गीतों में नव्यता और विशिष्टता कैसे आ पाती? कोई रचना अथवा गीत या नवगीत तभी ग्राह्य बन पाता है, जबकि उसमें भावाभिव्यक्ति की नवीनता और विशिष्टता हो। छोटे-बड़े, दुबले और स्थूलकाय सभी के पाँवों में एक ही नाप का जूता तो नहीं पहनाया जा सकता? काव्येतिहास के विविध युगों में भी कभी ऐसा नहीं हुआ, जब एकरूपता और एकरसता की ऐसी स्थिति आ जाती है तो उसकी प्रतिक्रिया और प्रत्याख्‍यान भी आवश्यक हो जाते हैं। विकास के ज्ञातव्य के लिए यह वैविध्य प्रयोजन ही है। ठेठ सड़क छाप मुहावरे में कहा जाए तो जो अंतर गध, खच्‍चर और घोड़े में होता है, वही एक साधारण गीत और विशिष्ट नवगीत में भी मिलता है। चीज़ों की पहचान बाह्य एतादृशता से कभी संभव नहीं होती। ईश्वर क्या है, इस प्रश्न को सहस्रों वर्ष पर्यंत इस ग्रंथी को नहीं समझाया जा सका और अंततः ऋषियों और मनीषियों को नेतिवाद की शरण में जाना पड़ा। ठीक इसी तरह नवगीत की अपरिभाषेयता में ही उसकी परिभाषा निहित है। यों सहजता और सरलता के लिए यह कहा जाए कि जहाँ छंद, लय, तान, शैली, शिल्‍प और अनुभूति तथा संवेदना की नव्यता हो, वहीं कहीं नवगीत की स्थिति संभाव्य है। गीत में निहित इस नव्यता को भेदकातिशयोक्ति अलंकार के प्रसिद्ध उदाहरण से स्प्‍ट करूँ तो यही कहना चाहूँगा- ‘वह छवि तो औरै कछू, जिहि बस होत सुजान' इस ‘औरै कछू' को देखने और भाषित करने के लिए कुछ अंतर्दृष्‍टि विशेष का होना भी आवश्यक है।

‘व्योम'ः गीत से नवगीत तक की यात्रा में हिंदी कविता ने कौन-कौन सी महत्त्वपूर्ण उपलब्ध्यिाँ हासिल की हैं?

दे.श. इंद्र ः यह प्रश्न अपने आपमें जितना सीध और सपाट प्रतीत होता है, उतना ही जटिल भी है। यदि आप छायावादेतर मंचीय कवियों के संग्रहों के गीतों और शंभुनाथ सिंह, ठाकुरप्रसाद सिंह तथा वीरेंद्र मिश्र के परवर्ती संग्रहों के क्रम में उमाकांत मालवीय, मेरे, माहेश्वर तिवारी, कुमार रवींद्र और योगेंद्रदत्त शर्मा के गीत-संग्रहों की रचनाओं को ही ग़ौर से देख और पढ-समझ सकें तो आप अपने प्रश्न का उत्तर खोज निकाल सकेंगे। इधर महेश ‘अनघ' और यश मालवीय के गीत-संग्रहों से भी आपको अपने प्रश्न के समाधान मिल सकते हैं।

‘व्योम'ः आपने अपनी लंबी सृजन-यात्रा के दौरान गीत के अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। वर्तमान में भी गीत के अस्‍तित्व को नकारा जा रहा है, अनेक रूपों में भ्रामक दुष्‍प्रचार भी किया जा रहा है। इन परिस्थितियों में क्या आप मानते हैं कि गीत के विरुद्ध एक मोर्चा सुनियोजित रूप से लामबंद है? यदि हाँ तो उससे हिंदी साहित्य कितना और किस तरह से प्रभावित होगा।

दे.श. इंद्र ः हाँ, निश्चय ही मेरी गीत-सृजन की यात्रा बासठ-तिरसठ वर्ष पुरानी तो है ही और इस दीर्घ अवधि में मैंने बहुत उतार-चढ़ाव भी देखे और सुने हैं। एक कहावत है कि चोरों, उचक्कों और दुर्जनों में पारस्परिक मेलजोल और ‘अनहोली एलाइंस' तो बहुत जल्दी हो जाता है, परंतु एक विद्वान दूसरे से अवश्य ईर्ष्या, द्वेष और बैरभाव ग्रस्त होता है। बड़े से बड़े कवियों से लेकर सामान्य से सामान्य कवि भी इस प्रवृत्ति के शिकार रहे हैं। पहले तो मंगलाप्रसाद और देव पुरस्कार ही होते थे, फिर ज्ञानपीठ और सरस्वती पुरस्कार जैसे सैकड़ों पुरस्कार शुरू हुए। आज तो इनकी संख्या अनगिनत है। इन्हें पाने की दौड़ में लोग क्या-क्या हथकंडे नहीं अपनाते। कितना नीचे नहीं गिरते और कितने ग़लत समझौते नहीं अपनाते। मुझे प्रसन्नता और संतोष है कि मैंने यह रास्ता न चुनकर एकांत शब्द-साधना की। मैंने कभी मंचीय सौदे नहीं किए और न ही किसी दक्षिणपंथी अथवा वामपंथी या प्रगतिशील संघ की सदस्यता ग्रहण की। पिछली शताब्दी में आधुनिकता के चलते हर श्रेष्ठ और उदात्त को अस्वीकार और पदच्युत किया गया। पहले नीत्शे ने ईश्वर को मारा था, किंतु हुआ उसके विपरीत। ईश्वर आज भी जीवित है और नीत्शे महोदय नास्ति में विलीन हो गए। विश्व साहित्य पर दृष्टि डालें तो पहले कविता का जन्म हुआ, तत्‍पश्चात गद्य का। हमारे यहाँ भी ऐसा ही हुआ। आदिकाल भक्तिकाल और रीतिकाल तक कविता का बोलबाला रहा। विगत डेढ़-पौने दो सौ वर्ष ही गद्य के खाते में जाते हैं। अधिकतर कहानी, उपन्यास, नाटक और समीक्षाएँ लिखने वाले असफल कवि ही हैं। अतः उनकी हीनता-ग्रंथी का विस्फोट काव्य को गरियाने के रूप में ही हुआ। न किसी के कहने से कविता मरेगी, न गीत। आज भी गीतों और ग़ज़लोंं के संकलन पर्याप्त मात्रा में छप रहे हैं, जिनमें स्तरीय संग्रह अपेक्षाकृत न्यून होते हैं और यह स्थिति अन्य विधाओं में भी द्रष्टव्य है। जहाँ तक विरोधियों की लामबंदी की बात है, वह तो स्पष्ट ही है। प्रचार-प्रसार और मीडिया में सर्वत्र ही गीत-विरोधी तत्वों का बोलबाला रहता है, जिसका खामियाज़ा तो गीत को उठाना ही पड़ता है। ‘करे कोई, भरे कोई' की लांछना का शिकार भी गीत को होना पड़ा है। कविसम्मेलनीय मंचों की अधोगति का दंड गंभीर और साहित्यिक गीत को भी सहना पड़ा है। सुना था कि तीन-चार वर्ष पूर्व किसी पत्रिका में परम पूज्‍य मंगलेश डबराल जी ने गीत के विरोध में कुछ कहा था, जिसका कई लोगों ने उन्‍हें करारा जवाब भी दिया था। यदि पंत जी के लोकायतन को विजयदेव नारायण शाही ने नहीं पढ़ा, तो इससे उनका क्या घट गया? कुछ दिनों पहले भी एक शीर्षस्थ आलोचक ने पंत जी की निंदा की थी, तो वह उन्हें भारी पड़ गई थी। यदि कोई शैलेष मटियानी को कथाकार न माने या उनके निधन पर दो शब्द भी न बोलना चाहे, तो शैलेष की इसमें कौन-सी क्षति हो गई? कुछ दिनों पूर्व ही एक स्वनामधन्य और प्रातः स्‍मरणीय अदबी हस्ती ने भविष्यवाणी की है कि साहित्य मर जाएगा, कविता मर जाएगी और न जाने क्या-क्या नहीं मर जाएगा ...। तो ऐसे ही अनर्गल भविष्यवाणियों की चिंता नहीं करनी चाहिए। लोग खबरों में बने रहने के लिए जाने क्या-क्या नहीं कह देते? इस बात का तो यह समय ही साक्षी है कि नई कविता के नाम पर जो सैकड़ों टन काग़ज़ काला किया गया, उसे दीमकों ने चाट लिया। कहने का तात्पर्य यही है कि यदि आपमें माद्दा है और आप अपनी धुन के पक्के हैं, तो चलते रहिए ...। यह यात्रा व्यर्थ नहीं जाएगी। यों इस दुनिया में सार्थक है ही क्या? नकार और स्वीकार का दौर हर युग में चलता रहा है।

‘व्योम'ः वर्तमान में हिंदी की तथाकथित प्रमुख व बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं, यथा- नया ज्ञानोदय, समकालीन भारतीय साहित्य, वागर्थ, पाखी, वर्तमान साहित्य, इंद्रप्रस्थ भारती, विपाशा, तद्‌भव आदि में गीत विधा की रचनाओं को स्थान लगभग नहीं ही दिया जाता है। साथ ही हिंदी साहित्य के प्रमुख संस्थानों- भारतीय ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, हिंदी अकादमी और अधिकतर राज्यों की साहित्य अकादमियों आदि में भी शीर्ष पदों पर गीत अथवा छांदस कविता के रचनाकार आज तक पदासीन नहीं हो सके। इस सबके पीछे आप किन कारणों को ज़िम्मेदार मानते हैं? क्‍या भविष्य में परिस्थितियों में परिवर्तन की आशा की जा सकती है?

दे.श. इंद्र ः आपने इस प्रश्न के साथ स्वयं ही उत्तर भी दे दिया है। सचमुच ही यह एक चिंताजनक स्थिति है। इस ्‍थिति से निजात पाना आसान भी नहीं है। अज्ञेय जी के द्वारा जो बीज कभी योजनापूर्वक बोये गये थे, उसकी फ़सल आज तक उग रही है। उससे मुक्त होने के लिए गीतधर्मी बिरादरी को भी कुछ वैसा ही संघर्ष और उद्यम करना पड़ेगा, जिसकी फ़िलहाल आशा नहीं की जा सकती। अगले दो दशकों में जब तक इन प्रतिष्ठानों में पदासीन विभूतियाँ अवकाश ग्रहण करेंगी, तब तक हिंदी के वरिष्ठ नवगीतकार भी शायद नहीं रह पाएँगे। आज तो स्वयं नवगीतकारों में मनोमालिन्य, मतांतर और आत्मसम्मोहन का भाव है, जिससे उनका एकजुट होना मुमकिन नहीं लगता। फिर भी किसी सुखद चमत्कार की आशा करने से तो आपको कोई वर्जित नहीं करता। ‘संघे शक्ति कलौ युगे' की नीति जगजीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त है, तो नवगीतकारों को एक शामियाने के तले बैठने से कौन रोक सकता है? अभी तो नवगीत को विश्वविद्यालयों के पाठ्‌यक्रमों में निर्धारित होने की ही प्रतीक्षा है। अतः उसे पाठ्‌य और अनुसंधेय बनाने की आवश्यकता है। फिर एक बात और, मीडिया के शीर्ष पदों पर आसीन होने के लिए आप भी उस लाइन में लग जाइए। यह तो सर्वविदित तथ्य है कि ज़माना अब प्रतिभा का न होकर जोड़-तोड़, अप्रोच और लेनदेन का हो गया है। साहित्य सर्जना करने वालों को अपनी उदरपूर्ति और पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करने के लिए आजीविका पर भी आश्रित रहना पड़ता है। बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में चार-छः गीत छप जाएँ और उन पर थोड़ा पारिश्रमिक मिल भी जाए, तो उससे गुज़र-बसर नहीं हो सकती। सृजन-कर्म स्वयं में एक ‘वाकिंग स्‍टिक' है, बैसाखी नहीं। चलने के लिए मज़बूत पाँव और दृढ़ इच्छा शक्‍ति का होना भी बहुत ज़रूरी है।

व्‍योम ः आज इंटरनेट का युग है और इंटरनेट पर अनेक साहित्यिक पत्रिकाएँ- अनुभूति, कविताकोश, हिंदयुग्म, सृजनगाथा, काव्यालय, गीत-पहल आदि और अनेक ब्‍लाग्स- पूर्वाभास, छांदसिक अनुगायन, रचनाकार, काव्यांचल, आखर-कलश, नवगीत आदि काफी चर्चित हैं और गीत को लेकर अच्‍छा काम कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि भविष्य में साहित्य इंटरनेट पर ही जीवित रहेगा। साहित्यिक कृतियाँ छपी पुस्तकों के रूप में नहीं, ई-बुक के रूप में होंगी। आप इससे कितने सहमत या असहमत हैं और क्यों?

दे.श. इंद्र ः यह मेरी स्वीकारोक्ति है कि मैं इस क्षेत्र में नितांत शून्य और अनभिज्ञ हूँ। अपनी इस अनभिज्ञता के कारण मुझे क्षति भी उठानी पड़ रही है और मुझे यह भी विदित नहीं है कि जो इस क्षेत्र में दक्ष हैं, उन्‍हें क्या और कितना लाभ मिल रहा है? वैसे भी अब मैं मृत्यु के कगार तक आ पहुँचा हूँ। आगे क्या होगा, क्या नहीं होगा, यह चिंता करना उनके लिए प्रयोजनीय है, जिन्‍हें अभी लंबे समय तक जीना और सृजनरत रहना है। इस क्षेत्र में ‘इग्नोरेंस इज़ ब्लिस' ही मेरा आश्रय वाक्य है।

‘व्योम'ः हिंदी साहित्य में कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में महिला रचनाकारों ने तो पर्याप्‍त संख्‍या में अपनी महत्त्वपूर्ण भागीदारी की, किंतु गीत-नवगीत के क्षेत्र में संख्या अत्यधिक कम रही और समीक्षा के क्षेत्र में तो स्थिति और भी निराशाजनक है। आपको क्या लगता है?

दे.श. इंद्र ः कहानी कहने की दिशा में तो सैकड़ों साल से दादियों और नानियों का ही एकछत्र अधिकार रहा है, पिता, दादा और नाना ने कभी कहानियाँ सुनाने के झंडे नहीं गाड़े। ये लोग तो उपदेश, आदेश अथवा संदेश देने के लिए ही विख्यात रहे हैं। आज की पढ़ी-लिखी महिलाएँ यदि कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में आगे हैं, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। नारियों ने लोकगीत के क्षेत्र में तो कीर्तिमान स्थापित किए, किंतु काव्य-सर्जना की ओर वे कम ही उन्मुख हुईं। भक्ति-युग में मीराबाई और छायावाद युग में महादेवी वर्मा जैसी महीयसी महिलाओं का आविर्भाव हुआ। यों आधुनिक युग में सुमित्र कुमारी सिन्हा, सुभद्रा कुमारी चौहान, विद्यावती कोकिल आदि ने भी सुंदर कविताएँ लिखीं। प्रगतिवादी युग में एक भी उल्लेखनीय कवयित्री नहीं हुई। प्रयोगवाद और नई कविता का उल्‍लेख यहाँ नितांत अप्रासंगिक ही होगा। जहाँ तक नवगीत काव्य का संबंध है, श्रीमती शैल रस्तोगी, श्रीमती शांति सुमन और अब डा. यशोधरा राठौर ने अच्‍छे नवगीत लिखे हैं। श्रीमती राजकुमारी रश्मि  भी एक उम्दा नवगीतकार कही जा सकती हैं। मेरी इस दशा में यही राय है कि इन्हें तथाकथित जनवादी गीत से थोड़ी दूरी बनाकर रखनी चाहिए।

‘व्योम'ः आजकल एक नया प्रयोग प्रचलन में है कि हिंदी के रचनाकार ग़ज़ल और उर्दू के रचनाकार गीत लिख रहे हैं। फलतः शिल्प दोष का खतरा दोनों ओर ही है। आपने भी विपुल मात्र में ग़ज़लें कही हैं, क्या आप मानते हैं कि इस तरह का प्रयोग दुधारी तलवार पर चलने जैसा है?

दे.श. इंद्र ः यह तो मुझे मालूम है कि अधिकतर गीतकार ग़ज़लें कह रहे हैं, किंतु मेरी जानकारी इस विषय में नगण्य ही है कि उर्दू के ग़ज़लगो हिंदी में गीत लिख रहे हैं। मोटे तौर पर हिंदी और उर्दू दोनों ज़ुबानों में कोई अधिक फ़र्क़ नहीं है, फिर भी यह तो एक ज्वलंत सत्य है कि हिंदी की प्रकृति संस्कृतोन्मुखी है और उर्दू की रगों में फारसी, ईरानी और अरबी ज़्‍बानों का रक्त बहता है। दोनों का छंदशास्त्र भी काफी हद तक जुदा और मुख़्तलिफ़ है। अतः बहुत सोच-समझकर ही दोनों नावों पर अपने दोनों पाँव अलग-अलग रखने चाहिए। हिंदी के गीतकारों ने जो हिंदी-ग़ज़ल का नारा दिया है, अभी वे क़ायदे से उसे बुलंद नहीं कर पा रहे हैं। यों तो ‘स्वर्ध्‍मे निध्‍नं श्रेयः' से बेहतर कोई रास्ता ही नहीं है, क्‍योंकि ‘परधर्मो भयावहः' ही उसकी दारुण परिणति होगी। ऐसी इबादत या मुहब्बत से भी कोई लाभ नहीं है कि ‘ना खुदा ही मिला ना विसाले-सनम' वाली स्थिति आ जाए। ताहम मेरा कहना है कि यदि आप एक से अधिक भाषाएँ लिख, बोल और समझ सकते हैं, तो उनमें अभिव्यक्ति भी कर सकते हैं। श्रीमती सरोजनी नायडू, हरीन्द्रनाथ चट्‌टोपाध्‍याय, आर.के. नारायण, प्रेमचंद, उपेंद्रनाथ अश्क, अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री और नागार्जुन आदि बीसियों उदाहरण हैं उन रचनाकारों के जिन्होंने एकाधिक भाषाओं में लिखा है और खूब लिखा है। रही बात शिल्प दोष की सो यह दोष एक भाषा में लिखने वाले व्यक्ति में भी हो सकता है। आज जो लोग नवगीत लिख रहे हैं, उनमें से चालीस प्रतिशत के छंद सदोष होते हैं, क्योंकि हर छंद की एक लय भी होती है, जिस पर सभी की पकड़ एक जैसी और अधिकारपूर्ण नहीं हुआ करती। नंगे पाँव चलते समय एक धर की तलवार ही पाँव काटने के लिए काफी है, दुधारी तलवार तो और भी जानलेवा हो सकती है। अमीर खुसरो, रहीम और तुलसी बनने के लिए साधना तो करनी ही पड़ती है। बिना साधना किए हुए बहुत कुछ साध्‍ने वाले व्यक्ति के आगे तो खतरे ही खतरे हैं। जब कल का गीतकार आज नई कविता लिख सकता है (पंत, दिनकर, बच्‍चन, गिरिजाकुमार माथुर, सुमन, भवानीप्रसाद मिश्र और भारती की तरह) तो वह दोहा व ग़ज़ल कहने की मुमानियत की सज़ा क्यों झेले। हाँ, मैं इतना विनम्र निवेदन करूँगा कि यदि मुझे हज़ारों पृष्ठों का गद्य लेखन, इक्‍कीस हज़ार दोहे और लगभग एक हज़ार ग़ज़लें न कहनी पड़तीं, तो मैं नवगीत को कुछ और अवदान प्रस्तुत कर पाता। मैं आशा करता हूँ कि आगामी वर्ष के प्रारंभ में मैं अपने पाठकों की सेवा में अपना चौदहवाँ नवगीत-संग्रह भेंट कर सकूँ। अंत में कहना चाहूँगा कि आप चाहे जितनी भाषाओं और विधाओं में अपनी अभिव्यक्ति करें, किंतु पूरी तैयारी के साथ करें।

‘व्योम'ः कविता आलोचना के संदर्भ में भी प्रायः नई कविता को ही प्राथमिकता दी गई और गीत-नवगीत को सुनियोजित ढंग से हाशिये पर ध्‍केल दिया गया। फलतः हिंदी कविता की प्रमुख विधा गीत के संदर्भ में आलोचना लगभग नहीं ही हुई। आपकी दृष्टि में गीत-नवगीत के लिए यह कितना उचित अथवा अनुचित रहा और क्यों?

दे.श. इंद्र ः देखिए, आपका प्रश्न बड़ा वाजिब है और मोटे तौर पर ऐसा लगता भी है कि गीत के प्रति आलोचकीय दृष्टि उपेक्षा और उदासीनता भरी रही है, किंतु मैं इससे पूर्णतः सहमत भी नहीं हूँ। दरअसल हिंदी साहित्य का इतिहास अब तक लगभग डेढ़ हज़ार वर्ष पुराना हो चुका है। आदिकाल से लेकर अब तक इसमें लगभग पाँच हज़ार कवि भी हो चुके होंगे। आधुनिक युग के संबंध में गद्य के आविर्भाव के साथ कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, जीवनी, आत्मकथा, ललित निबंध, गद्य काव्य और साक्षात्कार जैसी दर्जनों विधाओं ने न केवल जन्म लिया, अपितु थोड़े ही से समय में स्वयं को उत्कर्ष के उच्च शिखर तक ला पहुँचाया, तो आलोचक की उदार और निष्पक्ष दृष्टि उन सब पर ही यथावसर पड़ना लाज़िमी है। अंत में साहित्य पर भी आलोचक की दृष्टि पड़ती ही है। ऐसी स्थिति में नवगीत के हिस्से में कितनी मात्र में आलोचकीय दृष्टि पड़ सकेगी? फिर यह भी न भूलिये कि परिमाण की दृष्टि से आपके पास कितना है, जिसका मूल्यांकन आवश्यक अनुसंधान का विषय बन सकता है, जबकि आपकी विधा में कितने समर्थ रचनाकार हैं? यदि हमने लिखे तो केवल पचास गीत हैं और जिनका ले-देकर एक ही संकलन आ पाया है, तो हम पर पी-एच.डी. और डी.लिट्‌. तो क्या, एम.फिल भी नहीं की जा सकती। जिन्‍होंने साहित्य सर्जना में जितनी लंबी पारी खेली हो, उसके अनुरूप ही समीक्षक और अनुसंधता उन पर दृष्टिपात करता है। वास्तविकता तो यह है कि अब धीरे-धीरे महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के द्वार नवगीत के लिए भी उद्‌घाटित होने लगे हैं। अनेक नवगीतकारों पर एम.फिल और पी-एच.डी. स्‍तर का कार्य हुआ है और हो भी रहा है। पत्र-पत्रिकाएँ भी नवगीत को छाप रही हैं। नवगीत और नवगीतकारों पर स्वतंत्र पुस्तकों और शोधग्रंथों का प्रकाशन भी होने लगा है। अतः कुल मिलाकर अब स्थिति वैसी नहीं है, जैसी दो दशक पूर्व थी। एक बात और, नवगीत अपने आप में जितना नया है, उतना पुराना भी तो है। आखिर लिखा तो उसे भी छंद में ही जाता है। शब्द-शक्ति  (अमिधा, लक्षणा, व्‍यंजना) विशेषतः प्रतीक, अलंकार, लय, शैली आदि के काव्‍यशास्त्र से न तो आज के प्रोफेसर या समीक्षक ही सिर टकराना चाहते हैं और न ही उनके शोधार्थी शिष्यगण। इसलिए कहानी, उपन्यास, जीवनी, दलित-विमर्श, महिला-विमर्श अथवा समाजशास्त्रीय आदि विषय लेकर जैसे-तैसे दो-तीन वर्ष के भीतर पी-एच.डी. करके नौकरी पा जाते हैं। जिसे रसगुल्लों से भरा थाल मिल जाए, वह छुआरे चबाना क्यों पसंद करेगा? अब तो सबके लिए द्वार खुला हुआ है। यदि कोई समीक्षक आप पर नहीं लिखता, तो आप व्यक्तिगत रूप से अपने ऊपर चार सौ से लेकर सात सौ पृष्ठों का अभिनंदन-ग्रंथ निकलवा लीजिए। गाँठ से मुद्राएँ खर्च कीजिए, लोग आपको टैगोर, तुलसी और कालिदास से भी बड़ा और विश्वस्तर तक का कवि कह देंगे। अस्तु, चिंता न कीजिए, नवगीत का भविष्य उज्ज्वल और आश्वस्ति पूर्ण ही है, उसके वर्तमान की चिंता करना अधिक ज़रूरी है।

‘व्योम'ः गीत-नवगीत के संदर्भ में नई पीढ़ी के रचनाकर्म की दशा और दिशा क्या है? नई पीढ़ी के ऐसे कौन-से रचनाकार हैं, जिनकी रचनाधर्मिता आपको प्रभावित करती है तथा नई पीढ़ी से आपकी अपेक्षाएँ क्या हैं?

दे.श. इंद्र ः यह सच है कि आदरणीय निराला जी के दिवंगत होने के पश्‍चात अब तक नवगीत में भी कई पीढ़ियों का आवागमन हो चुका है। साहित्य में पीढ़ियों को रचनाकार की आयु की अपेक्षा उसके सर्जनात्मक प्रदेय के हिसाब से मान्यता मिलनी चाहिए। उदाहरण के लिए अभी यश मालवीय आयु की दृष्टि से अपने पचासवें वर्ष के क़रीब हैं और वे महेश अनघ, विष्‍णु विराट, योगेंद्रदत्त शर्मा, ओमप्रकाश सिंह से आयु में तो कनिष्ठ हैं, किंतु अपनी रचनात्मक गुणवत्ता के आधर पर पचासों नवगीतकारों से वरिष्ठ हैं। ऐसी स्‍थिति में कौन बड़ा है और कौन छोटा? फिर भी मुझे यह कहते हुए थोड़ा खेद होता है कि परवर्ती नवगीतकार सीधे चोट करने की इच्छा के वशीभूत होकर अपनी अनेक शैल्पिक अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता। जो बिंबात्मकता कभी नवगीत का कंठहार थी, उसे गले की फाँसी समझकर उतार दिया गया है। आज की व्यवस्था ने लोकजीवन और महानगरों की जीवनशैली के व्यवधान और अंतर को कम किया है। पारिवारिक विघटन नगरों की भाँति गाँवों में भी हो रहा है। महँगाई ने देहात और शहर दोनों को बुरी तरह से कुचल रखा है। हिंसा, असुरक्षा और अराजकता से सभी संग्रस्त  हैं। क्या सुदूर छत्तीसगढ़ के आदिवासी और क्या मुंबई तथा दिल्ली जैसे बड़े शहरों में रहने वाला आम आदमी ...। ऐसी स्थिति में केवल लोक और अंचल तक स्वयं को परिसीमित कर लेना कहाँ तक मुनासिब होगा। ताज़गी और टटकेपन की मौलिकता के नाम पर आप अपने जनपदों की बोलियों के शब्दों की इतनी भरमार भी न करें कि हिंदी के एक छोर का पाठक दूसरे छोर के रचनाकार को समझने में क़वायद करने लगे। नया गीतकार छंद और लय को सि( करने की दिशा में कृत्कार्य क्‍यों नहीं होना चाहता? रही बात प्रभावित होने की, सो नये लोग ही प्रभावित होते हैं पुरानों को देखकर। पिता और दादा से पुत्र और पौत्र सीखते हैं, पुत्रों और पौत्रों की उपलब्धियों पर उनके पूर्व जन्माओं तथा हर्ष और परितोष ही होता है। वह हर्ष, वह परितोष आपके गीत सृजन को देखकर मुझे भी होता है। मेरी हार्दिक कामना है कि नवगीत के रथ को आप सब मिलकर और भी गति प्रदान करें। अच्छे गीत को लिखने के लिए यह भी बहुत ज़रूरी है कि आप स्वयं कितना अध्ययन करते हैं। कविसम्मेलनीय कवियों को तो गाने-बजाने से ही फुर्सत नहीं मिलती। उन्हें यह भी आशंका बनी रहती है कि कहीं दूसरों को पढ़कर उनकी मौलिकता (?) क्षत-विक्षत न हो जाए। जो लोग गीत-नवगीत पर समीक्षात्मक लेखनी उठाते हैं, वे भी यदि अपने छंद, लय संबंधी ज्ञान को थोड़ा सुधारें, तो नवगीत के मूल्यांकन के लिए हितावह होगा।

‘व्योम'ः आपका बहुत-बहुत ध्‍न्यवाद।

--

श्री देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र' का पता-

10/61, सेक्‍टर-3, राजेंद्रनगर, साहिबाबाद,
ग़ाज़ियाबाद-201005 (उ.प्र.) 

रविवार, 25 दिसंबर 2011

श्री माहेश्वर तिवारी से योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ की एक बातचीत



              हिन्दी साहित्य में जब-जब नवगीत की संवेदना और युगीन संदर्भों के साथ-साथ भाषागत सहजता व आंचलिक मिठास की चर्चा होती है, हिन्दी नवगीत के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के सृजनात्मक उल्लेख के बिना न तो वह पूर्ण होती है और ना ही उस चर्चा का कोई महत्व रहता है । हिन्दी नवगीत के वह महत्वपूर्ण और अद्वितीय हस्ताक्षर श्री माहेश्वर तिवारी हैं । 22 जुलाई 1939 को बस्ती (उ.प्र.) में जन्मना श्री तिवारी की अब तक 4 नवगीत कृतियों - ‘हरसिंगार कोई तो हो’ , ‘नदी का अकेलापन’, ‘सच की कोई शर्त नहीं’ और ‘फूल आए हैं कनेरों में’ के अतिरिक्त नवगीत की कई पांडुलिपियाँ प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं । नवगीत के संदर्भ में श्री तिवारी से महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर बातचीत की युवा गीतकवि योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ ने - 

व्योम ः नवगीत आपकी दृष्टि में क्या है और इसकी क्या-क्या शर्तें व मर्यादायें हैं ?
मा.ति. ः नवगीत भारतीयता से जुड़ा और आधुनिकता तथा वैज्ञानिक बोध से जुड़ा वह काव्य-रूप है जो छायावादोत्तर गीत-धारा से, गेयत्व को छोड़कर शेष सभी रूपों में आधुनिक मनुष्य का गीत है । इसमें प्रेम के नाम पर न तो मध्यकालीन परकीया भाव है और न कुहासे से भरी कल्पनाशीलता । इसमें सजग सामाजिक बोध और घर-आँगन का विश्वसनीय चेहरा है ।आधुनिकता से उपजीं विकृतियों के प्रति भी चौकन्नी जागरुकता, राजनीतिक, आर्थिक विसंगतियों के प्रति एक प्रतिपक्ष का भाव तो इसमें है ही, सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें
भारतीय संस्कृति और देशी ज़मीन के प्रति गहरे सरोकार भी हैं । यह समकालीन अन्य तमाम रूपों की तरह आयातित काव्य-रूप नहीं है । यह निजत्व से जुड़ा होकर भी उस आत्माभिव्यक्ति से मुक्त है जो कभी-कभी कविता के धरातल से खिसककर डायरी के रूप में सामने आ जाता है ।
 
व्योम ः आपका सबसे प्रथम् नवगीत कौन सा था तथा कब और कहाँ प्रकाशित हुआ ?
मा.ति.: मैंने जिस समय गीत लेखन आरंभ किया उस समय ‘नवगीत’ शब्द चर्चा में नहीं था । तार-सप्तक के कवियों ने तथा उससे बाहर के प्रयोगवादी व नई कविता के कवियों ने जो गीत लिखे उन्हें कुछ समय तक नई कविता के गीत और नया गीत के नाम से जाना-पहचाना जाता रहा । सन् 1960 के बाद नए गीत कवियों की रचनाओं के लिए ‘नवगीत’ शब्द केन्द्र में आया । मेरे जिस गीत को लेकर मुझे नवगीतकारों में शामिल किया गया, वह है - ‘आओ हम धूप-वृक्ष काटें/इधर-उधर हल्कापन बाँटें’ । यह गीत पहली बार वाराणसी से प्रकाशित ‘मराल’ पत्रिका में सन् 1964 में छपा और चर्चित हुआ ।
 
व्योम ः गीत से नवगीत तक की यात्रा में हिन्दी कविता ने कौन-कौन सी उपलब्धियाँ हासिल कीं ?
मा.ति. ः कई पड़ाव आए गीत से नवगीत तक की यात्रा में, गीत कभी प्रगीत बना, स्वच्छंदावादी गीत बना और फिर वह सन् साठ के बाद नवगीत बना । गीतों में प्रकृति-मनुष्य से अलग एक इकाई थी किन्तु नवगीत में वह सहचरी बन गई । भवानी प्रसाद मिश्र के गीत ‘सतपुड़ा के घने जंगल/ऊँघते अनमने मंगल’ और ‘आज पानी गिर रहा है/घर नयन में तिर रहा है’ जिस नए गीत की आहट देते हैं वह गीत से नवगीत के प्रस्थानक बिन्दु के रूप में स्वीकारा जा सकता है । इस अंतर को तत्कालीन ‘नीरज’ और वीरेन्द्र मिश्र के गीतों के माध्यम से भी जाँचा परखा जा सकता है । वीरेन्द्र मिश्र ने अपने पीड़ा वाले गीत में कहा है - ‘पीर मेरी कर रही ग़मगीन मुझको/और उससे भी अधिक तेरे नयन का नीर रानी/और उससे भी अधिक हर पाँव की जंजीर रानी’ जबकि नीरज लिख रहे थे - ‘देखती ही न दर्पण रहो प्राण तुम/प्यार का यह मुहूरत निकल जाएगा’ । गीत वैदिक ऋचाओं के रूप में उपजा और वह लोक जीवन तथा लोकमानस से होकर नवगीत तक आया । कुछ लोगों का मत है कि नवगीत नई कविता की अनुकृति से उपजा, यह मिथ्या भ्रम है । महाप्राण निराला की सरस्वतीवंदना में ‘नव-गति, नव-लय, ताल छंद नव’ ही नवगीत का बीजमंत्र कहा जा सकता है ।

व्योम ः कहा जाता है कि नई कविता से मुकाबले के लिए गीत को नवगीत का आवरण ओढ़ना  पड़ा, क्या पारंपरिक गीत में वह सामर्थ्य नहीं कि वह नई कविता को ललकार सके ? 
मा.ति. ः नवगीत नई कविता से मुकाबले के लिए ओढा गया कोई आवरण नहीं है । कविता के
इतिहास में यथार्थ के दबाव से इसका जन्म हुआ । तब स्वच्छंदतावादी धारा में लिजलिजी भावुकता या देहवादी आकुलता से सराबोर रोमानी गीत लिखे जा रहे थे जो गाने के लिए तो ठीक कहे जा सकते हैं, जीने के लिए नहीं । जब पूर्ववर्ती परंपरावादी गीत जीवन-यथार्थ, ऐसा यथार्थ जो बेडरूम के यथार्थ से अलग त्रिलोचन शास्त्री के शब्दों में, ‘मुझे जगत जीवन का प्रेमी/बना रहा है प्यार तुम्हारा’ वाला यथार्थ था, से अपना मुँह मोड़कर खड़ा था, नई कविता के लोग जिस गीत को केन्द्र में रखकर गीत-कविता को धकियाते और गरियाते रहे वह नई कविता को ललकारने की स्थिति में ही कहाँ था ।
 
व्योम ः स्व. डॉ.शम्भूनाथ सिंह द्वारा संपादित नवगीत दशक श्रंखला तथा नवगीत अर्द्धशती के संदर्भ
में कहा जाता है कि इन ऐतिहासिक समवेत संकलनों में तत्कालीन कुछ महत्वपूर्ण नाम सम्मलित नहीं हो सके, इसकी क्या वज़ह रही ?

मा.ति.: यह बात बिल्कुल सच है कि नवगीत दशक तथा नवगीत अर्द्धशती में कुछ महत्वपूर्ण रचनाकार छोड़ दिए गए या छूट गए । ऐसा तार सप्तक, दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक में भी हुआ था और पिछले दिनों साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘श्रेष्ठ गीत संचयन’ में भी यह कमी पाई गई । ऐसा प्रायः संपादक की निजी रुचि और संकलनों की सीमाओं के कारण भी होता है । नवगीत दशक-एक के प्रकाशन के बाद स्व. ठाकुरप्रसाद सिंह ने सबसे पहले इस बात को लेकर एतराज किया था कि उसमें कुछ ऐसे नाम हैं जो नहीं होने चाहिए और कुछ ऐसे महत्वपूर्ण नाम हैं जो होने चाहिए थे । एक बात यह भी है कि नवगीत दशक के प्रकाशन की प्रक्रिया 1968 में ही आरंभ हो गई थी और उस समय मात्र एक ही संकलन की योजना आर्थिक सहयोग के आधार पर तैयार हुई थी । उसमें कई नाम ऐसे थे जो बाद में दशकत्रयी में शामिल नहीं किए गए । उस संकलन की फ़ाइल संपादक की अपनी व्यस्तताओं और कुछ के आर्थिक सहयोग से इंकार कर देने के कारण फ़ाइलों के ढ़ेर में दबी रह गई । डॉ. सुरेश जब डॉ. शम्भूनाथ सिंह के निर्देशन में शोधकार्य में जुटे तो वह फाइल उनके हाथ लग गई तो डॉ. शम्भूनाथ जी से चर्चा उपरान्त तीन नवगीत दशकों के प्रकाशन की योजना बनी । इस योजना में मेरा नाम पहले दशक के रचनाकारों की सूची में था लेकिन जब आयुक्रम से चयन की बात आई तो मेरा नाम खिसककर दूसरे दशक में आ गया । बहरहाल स्व. राजेन्द्रप्रसाद सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, रवीन्द्र भ्रमर, शलभ श्रीराम सिंह जैसे प्रमुख लोगों का नाम दशक त्रयी में न होना हमारे लिए भी असहज कर देने वाला था । हमने अपने-अपने ढंग से अपनी आपत्तियाँ संपादक तक पहुँचायीं पर कोई सुनवाई नहीं हुई बल्कि स्व. ठाकुरप्रसाद सिंह तथा मुझे अपने एक लेख में डॉ. शंभूनाथजी ने नवगीत का शत्रु तक सिद्ध कर दिया लेकिन अपनी इस ग़लती का एहसास बाद में उन्हें भी हुआ और नवगीत अर्द्धशती में वीरेन्द्र मिश्र तथा शलभ श्रीराम सिंह को शामिल करने को वह तैयार थे किन्तु उन दोनों रचनाकारों की ओर से न तो कोई सकारात्मक उत्तर मिला और न रचनात्मक सहयोग । इससे नवगीत दशकों और नवगीत अर्द्धशती में एक अधूरापन तो रहा लेकिन इससे उनकी ऐतिहासिकता को नकारा नहीं जा सकता ।
 
व्योम ः आज कई वरिष्ठ गीत कवि नवगीत के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं और नवगीत
को ख़ारिज़ कर देते हैं, यह आपकी दृष्टि में कितना उचित या अनुचित है ?

मा.ति. ः ऐसे लोगों को लेकर मन में कोई अमर्षभाव नहीं जगता है । ऐसे लोगों के संदर्भ में मुझे
अपने गाँव का एक प्रसंग याद आता है । मेरे गाँव में एक चौबे जी थे, वह करेला शब्द सुनते ही चिढ़ जाते और क्रोध में आकर बोलने वाले को गरियाने लगते थे । लेकिन उनके मन में करेले को लेकर जो चिढ़ थी, वह आकार के प्रति थी या स्वाद के प्रति यह कोई नही जान पाया । हिन्दी के कुछ वरिष्ठ कवि जो नवगीत के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं, वे मुझे करेला बाबा के रूपान्तरण ही लगते हैं । उनके विषय में सोचकर स्व. रूपनारायण 
त्रिपाठी की पंक्तियाँ याद आती हैं - ‘कोई उनकी नज़र में उठता तो/हूक उठती कि हाय हम न हुए’ । जिस नवगीत को बाबा नागार्जुन, डॉ. विद्यानिवास मिश्र, आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री, डॉ. विजय बहादुर सिंह, कविवर भवानी प्रसाद मिश्र जैसे लोगों ने सराहा, उसमें कुछ तो है । गीत और नवगीत को लेकर झगड़ा करने वाले यह भूल जाते हैं कि नवगीत कोई ऊपर से टूटा आकाश-कुसुम नहीं है, वह परंपरा से ही उपजी नवता है । गीता के शब्दों में उसे ‘वस्त्राणि जीर्णानि यथा विहाय नवीन गृह्णाति नरोपाणि’ कहा जाता है । जब मनुष्य नवीन शरीर धारण करता है तो उसे नया नाम मिलता है लेकिन होता तो वह मनुष्य ही है । फिर नए और पुराने में जो स्वाभाविक द्वंद्वात्मक विकास है उसे तो सहजता से ही लेना चाहिए ।

व्योम ः वर्तमान में लिखे जा रहे नवगीतों में अभिनव प्रयोग के नाम पर सपाटबयानी भी परोसी जा
रही है, क्या यह नवगीत के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है ?

मा.ति. ः नवगीत एक बिंबप्रधान काव्य-रूप है । उसमें सहजता तो अभिप्रेय है लेकिन सपाटबयानी 
नहीं । सपाट सिर्फ़ गद्य हो सकता है कविता नहीं । सहज होने और सपाट होने में अंतर है । कविता की एक विशेषता यह भी कही जाती है कि वह जितना व्यक्त करती है उतना ही अनकहा भी छोड़ देती है । दरअसल यह अनकहा ही तो कविता है ।

व्योम ः एक प्रमुख दैनिक समाचारपत्र ‘दैनिक जागरण’ में प्रकाशित अपने आलेख में आपने सहज
गीत के संदर्भ में महत्वपूर्ण बातें कही हैं, सहज गीत नवगीत से कैसे और कितना भिन्न
है ? 

मा.ति. ः सहजगीत में मैंने ऐसी रचना की बात उठाने का प्रयास किया जो अभिव्यक्ति की सहजता
से जुड़ी हो । देखने में यह आता है कि कुछ लोग अतिशय प्रयोगशीलता के मोह में इस बात को भूल जाते हैं कि सम्प्रेषणीयता भी रचना की एक महत्वपूर्ण विशेषता है और भाषा, बिंब रचना के कारण दुरूहता के शिकार हो जाते हैं । ऐसी रचनाएँ चौंकाती ज़्यादा, भाती कम हैं और उनका अपने पाठक या श्रोता से सहज-संवाद नहीं बन पाता । वे इस प्रयास में विद्यापति, सूर, तुलसी के कुलगोत्र से हटकर केशवदास के कुलगोत्र में शामिल हो जाते हैं मेरी अवधारणा में सहजगीत में वे सारे गीत-रूप समाहित हैं जो अभिव्यक्ति में सहज और सम्प्रेषणीय हैं । नवगीत और सहजगीत में सिर्फ़ शब्द का अंतर है । नवगीत भी सहजगीत हो सकता है और सहजगीत नवगीत । कुछ लोग नवगीत के नाम पर कार्बन लेखन करते हैं और वे सहज-मौलिकता की परिधि से बाहर चले जाते हैं । एक महत्वपूर्ण बात है कि अपने आरंभिक काल में नवगीत ने लोकजीवन से नई ऊर्जा ग्रहण की लेकिन कुछ लोगों ने उसे नवगीत का प्रतिमान मानकर इतने आंचलिक प्रयोग किए विशेषतः भाषा के स्तर पर कि वे सम्प्रेषणीय नहीं रह गए । इसी तरह कुछ भाषाविदों ने तत्सम शब्दाबली के प्रति इतनी गहरी रुचि दिखलाई कि उनकी रचनाओं को समझने के लिए कभी-कभी पढे-लिखे लोगों को भी शब्दकोषों का सहारा लेना पड़ा । दरअसल इनसे मुक्त गीत ही नवगीत है, गीत नवांतर है, जनवादी गीत है जिसे मैं सहज गीत मानता हूँ ।

व्योम ः आपके नवगीतों में कथ्य और बिंबों में नयापन तथा भाषा में एक अलग तरह की मिठास
एक साथ गुंथी हुई होती है, ऐसा कैसे कर लेते हैं आप ?

मा.ति. ः मैं अपने कथ्य अपने समकालीन जनजीवन से उठाता हूँ । मुझे बिंब और भाषा के लिए 
किसी द्राविड़प्राणायाम की आवश्यकता महसूस नहीं होती । हमारे आसपास होती बतियाहट, जीवन के रस में डूबी शब्द संपदा स्वयँ यह मिठास भर देती है । कविता में मैंने भवानी प्रसाद मिश्र और ठाकुरप्रसाद सिंह से मिठास को पहचानना और अपनाना सीखा है, मैंने कुमार गंधर्व, पं. जसराज, किशोरी अमोनकर से संगीत की मिठास को अपने में महसूस किया है और फिर उसे अपने शब्दों, बिंबों में पिरोने का प्रयास किया है । जिस तरह गन्ने से मिठास पाई जाती है ऊपर का सख़्त छिलका, गांठें हटाकर । उसी तरह मैंने जीवन के खुरदुरेपन में भी मिठास पाने का प्रयत्न किया है । मैंने जीवन में रिश्तों को बहुत महत्व दिया है । सबको प्यार, अपनापन देने और सबसे पाने का आग्रही रहा हूँ । यह मिठास वहाँ से भी मिलती है । मेरे लिए घर मिठास का सबसे बड़ा श्रोत है । वहाँ से भाषा भी मिलती है और विचार भी ।

व्योम ः आप लम्बे समय से कविसम्मेलनीय मंचों से जुड़े रहे हैं, आज भी उसी ऊर्जा के साथ
  आपकी उपस्थिति मंचीय गरिमा में बृद्धि कर रही है । कृपया बताएँ कि आज अकविता के
  संक्रमण काल में क्या मंचों पर फिर से गीत का वही स्वर्णिम समय वापस लौटने की आशा
की जा सकती है ?

मा.ति. ः आप जिसे अकविता कहते हैं, मैं उसे कवित्वहीनता मानता हूँ । मैंने छठे दशक के उत्तरार्ध
से कविसम्मेलनों में जाना आरंभ किया था । उस समय जो कवि मंचों पर उपस्थित रहते थे वे साहित्य जगत के प्रतिष्ठित लोग थे । पत्र-पत्रिकाओं, पाठ्य-पुस्तकों से लेकर मंचों तक । सन् 1962 के बाद वह सिलसिला क्षीण होता गया । अब तो मंच पर उपस्थित लोगों में एकाध अपवाद को छोड़ दिया जाए तो मंचों पर अभिनेताओं व जोकर कवियों की ही भीड़ है । सही कविता को अपदस्थ करने का अनवरत प्रयास ज़ारी है लेकिन मैं निराश नहीं हूँ । निराश होना मेरे स्वभाव में नहीं है । कविता लौटेगी फिर मंचों पर गीत के रूप में भी और अन्य रूपों में भी, ऐसा मेरा विश्वास है ।

व्योम ः आपने भोजपुरी में भी रचनाकर्म किया है, नवगीतों को आंचलिक भावभूमि पर उसी भाषा
में पगाकर प्रस्तुत किया जाता रहा है, वर्तमान में रचे जा रहे नवगीतों में आंचलिक भाषा
की क्या भूमिका है तथा नई कोंपलों से आंचलिकता के संदर्भ में क्या-क्या आशाएँ की जा
सकती हैं ?

मा.ति. ः आंचलिकता रचना में नवता लाती है लेकिन वह दाल में छौंक या बघार की सीमा तक ही
होनी चाहिए । किन्तु जब आंचलिकता को ही पूरी दाल बनाने की कोशिश किसी रचना में हो तो वह कविता का दोष बन जाती है और रचना का प्रयोजन ही नष्ट हो जाता है । अपने आरंभिक काल में नवगीत के कई रचनाकारों ने यह काम किया लेकिन वह लोक- जीवन, लोक-प्रकृति, लोक-स्वर के स्तर पर और कुछ हद तक शब्द प्रयोग के स्तर पर भी । बहुत से लोग उसे शब्द तक ही सीमित कर देते हैं, इससे सम्प्रेषणीयता बाधित होती है । आंचलिकता को ऐसे लोग फै़शन के तौर पर लेते हैं, यह उचित नहीं है । शब्द को उसके परिवेश के साथ उठाना चाहिए ।

व्योम ः आपका विपुल सृजन और आपकी अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ किसी को भी आपसे
  ईर्ष्याभाव रखने लिए उकसा सकती है, फिरभी ऐसा क्या है जो आपको लगता है कि अभी
करना बाक़ी है ?

मा.ति. ः सृजन का मूल्यांकन संख्या के आधार पर नहीं उसकी गुणात्मकता के आधार पर होना
चाहिए । यह गुणात्मकता निरंतर सृजनशीलता से ही पाई जा सकती है । रचना में ठहराव या जो रच चुके हैं उसी को उपलब्धि मान लेना आत्महत्या है । मुझे महसूस होता है कि अब तक मैंने जो लिखा है उससे कहीं ज़्यादा अभी अनलिखा ही रह गया है । संभवतः माहेश्वर तिवारी को जो और जैसा लिखना था, वह अभी नहीं लिख पाए हैं इसीलिए उसतक पहुँचने और उसे लिखने के क्रम में ही लिखना ज़ारी है । हर रचना एक उपलब्धि है लेकिन उससे आगे जो है उसे पाने तक लिखना है । हो सकता है इस जीवन में संभव न हो तो अगले जीवन में भी उसके लिए प्रयासरत रह सकूँ, यही कामना है । एक बड़ी कविता लिखना चाहता हूँ गीत के रूप में, कुछ प्रबंधात्मक भी और वह जब तक न मिल जाए लिखते रहना है ।

व्योम ः गीत को केन्द्र में रखकर संकल्परथ, शिवम, उत्त्तरायण, समान्तर आदि अनेक पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं, हाल ही में इंटरनेट पर भी ‘गीत-पहल’ नाम से पूर्णतः गीत नवगीत को समर्पित पत्रिका शुरू हुई है और ‘पूर्वाभास’, ‘सुनहरी क़लम से’, ‘छांदसिक अनुगायन’आदि अनेक ब्लॉग्स भी है, इन प्रयासों से गीत के भविष्य को आप किस तरह देखते हैं ?
मा.ति. ः गीत केन्द्रित पत्रिकाएँ और इंटरनेट पर गीत-पहल ही नहीं कविता-कोश, सृजनगाथा,अनुभूति सहित ब्लॉग्स- पूर्वाभास, सुनहरी क़लम से, आदि मेरे विश्वास के ही तो कारक हैं ।
 
व्योम ः नवगीत के संदर्भ में नई पीढी की दशा और दिशा के विषय में आपका मत क्या है और नई पीढी से नवगीत के भविष्य के प्रति आपकी अपेक्षाएँ क्या हैं ?
मा.ति. ः गीत-लेखन साधना की अपेक्षा रखता है । नए लोग शार्टकट अपनाना चाहते हैं इसीलिए
आज गीतकवि कम संख्या में सामने आ रहे हैं । एक समय तो यश मालवीय और विनोद श्रीवास्तव तक आकर लगा कि नवगीत लेखन की परंपरा ख़त्म हो गई लेकिन यशोधरा राठौर, योगेन्द्र ‘व्योम’, जयकृष्ण ‘तुषार’, आनंद ‘गौरव’, देवेन्द्र ‘सफल’, शैलेन्द्र शर्मा, आनंद तिवारी, अवनीश सिंह चौहान, मनोज जैन ‘मधुर’ की रचनाशीलता के रूप में फिर नवगीत की डालों में कल्ले फूटते नज़र आने लगे हैं । नई पीढी से अपेक्षा है कि वह चकाचौंध (ग़ज़ल, दोहा आदि) से निकलकर गीत से, नवगीत से जुड़कर अपनी भारतीय कविता की जड़ों की ओर लौटे । यह लौटना पीछे लौटना नहीं, ठहराव से निकलकर आगे बढ़ना होगा । कविता को उसकी अपनी ज़मीन से जोड़ना होगा ।

व्योम ः कृपया अपने जीवन का कोई रोचक संस्मरण सुनाइये ?
मा.ति. ः जीवन तमाम प्रसंगों से भरा है । इस समय एक प्रसंग याद आ रहा है - सुल्तानपुर 
(उ.प्र.) के राजकीय इंटर कॉलेज में कविसम्मेलन था । संयोजक कथाकार स्व. गंगाप्रसाद मिश्र थे । उनसे मेरा पारिवारिक रिश्ता था । कविसम्मेलन में देर से पहुँचने के कारण जिन कपड़ों में था उन्हीं में सीधा मंच पर पहुँच गया ।मंच पर पहुँचते ही काव्यपाठ करना पड़ा । कविता पढ़कर मंच से उठकर चाय पीने के लिए आया । मैंनें कविसम्मेलन में अपना याद वाला गीत पढ़ा- ‘याद तुम्हारी जैसे कोई कंचन कलश भरे/जैसे कोई किरन अकेली पर्वत पार करे’ । चाय पी रहा था तो एक वयोबृद्ध सज्जन पास आए और ऐसा सवाल कर बैठे कि उनकी आयु और प्रश्न सुनकर मैं चौंक गया । उन सज्जन ने बड़ी गंभीरता से कहा - ‘तिवारीजी, मेरी एक जिज्ञासा है’ मैंने सहमति में अपना सिर हिलाया तो पूछ बैठे - ‘यह घटना कहाँ की है और यह किरन कौन है? क्या वह आपके साथ नहीं थी उस पहाड़ पर’ मैंने जैसे तैसे उन्हें टाला, और जब कवि मित्रों से उसकी चर्चा की तो सभी ठहाका मारकर हंस पड़े ।


श्री माहेश्वर तिवारी का पता - 
  'हरसिंगार' , ब/म - 48,
  नवीन  नगर ,काँठ रोड,
  मुरादाबाद (उ0प्र0)-244001
  चलभाष- 9456689998

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

नवगीतकारों से साक्षात्कार

 साक्षात्कार के माध्यम से रचनाकार से उसके रचनाकर्म के विषय  में तथा सामयिक सन्दर्भों के विषय में ज्यादा गहराई से जानने का अवसर मिलाता है .